पागल

इक वो वक्त था और एक ये वक्त है मनवीर
तब भरी रहती थी,अब बचती नही!

जिंदगी का बीता हुआ दौर सबको सुहाना लगता है,

और सब उसको फिर से जीना चाहता है।

गए हुए वक्त को लाने के लिए सब परेशान रहते हैं,

इसीलिए तो मेरे दोस्त पागल समझते है।


चक्र

ये जन्म मृत्यु खेल ही तो है ,


एक माता के गर्भ से निकलना जन्म है,

तो दूसरे माता के गर्भ में जाना मृत्यु।


सत्य तो ये है ये भटकन कब तक है ये तो ईश्वर ही जाने ।


इस पूरे यात्रा को सब नहीं जान सकता,हम तो बस जन्म के बाद और मृत्यु से पहले की जानकारी रखते है।


बांकी यात्रा की जानकारी कैसे हो?
ये चक्र जो है कैसे टूटे?

(ये चक्र कैसा है जाने कोई
ज्ञानी,
मनवीर चिंता छोड़ के नाम की महिमा गाई)

मदद

मैं बस में चढ़ गया। अंदर भीड़ देखकर मैं परेशान हो गया। बैठने की जगह नहीं थी। तभी, एक व्यक्ति ने अपनी सीट खाली कर दी। खाली सीट के बगल में खड़ा आदमी वहाँ बैठ सकता था, लेकिन इसके बजाय उसने मुझे सीट की पेशकश की।


अगले पड़ाव पर फिर वही काम हुआ। उसने अपनी सीट दूसरे को दे दी। पूरी यात्रा के दौरान 4 बार ऐसा हुआ। वह आदमी एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह लग रहा था, दिन भर काम करने के बाद घर लौट रहा था …
आखिरी पड़ाव पर जब हम सभी उतर गए, मैंने उससे बात की।
“हर बार खाली सीट मिलने पर आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी सीट क्यों दे रहे थे?”
उनका जवाब मुझे आश्चर्यचकित कर गया।
“मैंने अपने जीवन में बहुत अध्ययन नहीं किया है और न ही मुझे बहुत सी बातें पता हैं। मेरे पास ना तो बहुत पैसा नहीं है। इसलिए मेरे पास किसी को देने के लिए बहुत कुछ नहीं है। इसीलिए मैं यह रोज़ करता हूँ। यह एक ऐसी चीज़ है जो मैं कर सकता हूँ। आसानी से कर सकता हूं।
“पूरे दिन काम करने के बाद भी मैं थोड़ी देर तक खड़ा रह सकता हूं। मैंने अपनी सीट आपको दे दी और आपने धन्यवाद कहा। इससे मुझे संतोष हुआ कि मैंने किसी के लिए कुछ किया है।”
मैं इसे दैनिक तौर पर करता हूं और महसूस करता हूं कि मैं किसी तरह से अपना योगदान दे रहा हूं। मैं हर दिन घर में ताज़ा और खुश होकर आता हूं कि मैंने किसी को कुछ दिया। “
मैं अवाक था!!! दैनिक आधार पर किसी के लिए कुछ करने की चाहत ही अंतिम उपहार है।

इस अजनबी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया –
भीतर से अमीर बनना कितना आसान है!

सुंदर कपड़े, बैंक खाते में बहुत सारे पैसे, महंगे गैजेट्स, सामान और विलासिता या शैक्षिक डिग्री – आपको अमीर और खुश नहीं कर सकते हैं;

लेकिन देने का एक छोटा सा कार्य आपको हर रोज़ समृद्ध और खुश महसूस करने के लिए पर्याप्त हैं।18 दिन के युद्ध ने,
द्रोपदी की उम्र को
80 वर्ष जैसा कर दिया था …

शारीरिक रूप से भी
और मानसिक रूप से भी

शहर में चारों तरफ़
विधवाओं का बाहुल्य था..

पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था

अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में
निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।

तभी,

श्रीकृष्ण
कक्ष में दाखिल होते हैं

द्रौपदी
कृष्ण को देखते ही
दौड़कर उनसे लिपट जाती है …
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं

थोड़ी देर में,
उसे खुद से अलग करके
समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।

द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ??

ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।

कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !

वह हमारे कर्मों को
परिणामों में बदल देती है..

तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !

तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ… सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,
सारे कौरव समाप्त हो गए

तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !

द्रोपदी: सखा,
तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?

कृष्ण : नहीं द्रौपदी,
मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ
हमारे कर्मों के परिणाम को
हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं..
तो, हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।

द्रोपदी : तो क्या,
इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण ?

कृष्ण : नहीं, द्रौपदी
तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो…

लेकिन,

तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।

द्रोपदी : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

तुम बहुत कुछ कर सकती थी

कृष्ण:- जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ…
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती
तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !

इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया…
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते ।

और

उसके बाद
तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया…
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।

वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता…

तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।

“हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं” द्रोपदी…

और, हमें

“अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना
बहुत ज़रूरी होता है”…
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…
जिसका
“ज़हर”
उसके
“दाँतों” में नहीं,
“शब्दों ” में है…

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।

ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे, .
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

क्योंकि……. महाभारत हमारे अंदर ही छिपा हुआ है ।एक महिला की आदत थी कि वह हर रोज रात में सोने से पहले अपनी दिन भर की खुशियों को एक काग़ज़ पर लिख लिया करती थीं।

एक रात उसने लिखा…
मैं खुश हूं कि मेरा पति पूरी रात ज़ोरदार खर्राटे लेता है क्योंकि वह ज़िंदा है और मेरे पास है ना…भले ही उसकी खर्राटो की आवाज़ मुझें सोने नहीं देते…ये भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि मेरा बेटा सुबह सवेरे इस बात पर झगड़ता है कि रात भर मच्छर-खटमल सोने नहीं देते यानी वह रात घर पर गुज़रता है आवारागर्दी नहीं करता…इस पर भी भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि हर महीना बिजली,गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का अच्छा खासा टैक्स देना पड़ता है ,यानी ये सब चीजें मेरे पास,मेरे इस्तेमाल में हैं ना… अगर यह ना होती तो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…..

मैं खुश हूं कि दिन ख़त्म होने तक मेरा थकान से बुरा हाल हो जाता है….यानी मेरे अंदर दिनभर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत सिर्फ ऊपरवाले के आशीर्वाद से है…

मैं खुश हूं कि हर रोज अपने घर का झाड़ू पोछा करना पड़ता है और दरवाज़े -खिड़कियों को साफ करना पड़ता है शुक्र है मेरे पास घर तो है ना… जिनके पास छत नहीं उनका क्या हाल होता होगा…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि कभी कभार थोड़ी बीमार हो जाती हूँ यानी कि मैं ज़्यादातर सेहतमंद ही रहती हूं।इसके लिए भी भगवान का शुक्र है..

मैं खुश हूं कि हर साल दिवाली पर उपहार देने में पर्स ख़ाली हो जाता है यानी मेरे पास चाहने वाले मेरे अज़ीज़ रिश्तेदार ,दोस्त हैं जिन्हें उपहार दे सकूं…अगर ये ना हों तो ज़िन्दगी कितनी बे रौनक हो…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…..

मैं खुश हूं कि हर रोज अलार्म की आवाज़ पर उठ जाती हूँ यानी मुझे हर रोज़ एक नई सुबह देखना नसीब होती है…ज़ाहिर है ये भी भगवान का ही करम है…

जीने के इस फॉर्मूले पर अमल करते हुए अपनी भी और अपने से जुड़े सभी लोगों की ज़िंदगी संतोषपूर्ण बनानी चाहिए…..छोटी-छोटी परेशानियों में खुशियों की तलाश..
खुश रहने का अजीब अंदाज़…औऱ हर हाल में खुश रहने की कला ही जीवन है…….!!

साभार

प्रेम

जन्म, प्रेम , मृत्यु एक अटल सत्य है।


जन्म लेता है जीव और अपने ईश्वर से प्रेम करता है।


एवम अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है।


जन्म और मृत्यु आपके वश में नहीं ,


लेकिन प्रेम तो आपके वश में है ,


आपका प्रेम कैसा है

ये आपने अपने प्रेम को कितना समझा है ,

इसपर निर्भर करता है।


आप जिंदगी भर जिसकी तलाश करते है?


और जब अंत समय में जब आपको समझ मिलता है

तब आप मृत्यु के नजदीक रहते हैं ,

तो पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।


तब आप अपने आप को कोसते है ,

मैंने इतना समय इसको खोजने में लगा दिया।


प्रेम के वश में हैं भगवान,


जीव एक दुसरे से प्रेमवश जुड़ा रहता है।

इंतजार

मैं पढूंगा तब खाऊंगा,


नहीं बेटा पहले खा ले फिर पढ़ना।


नहीं मैं पढूंगा तब खाऊंगा।


नहीं बेटा रात बहुत हो गई है

तू खाना खा ले फिर मन लगा के पढ़ना,


नहीं मां मुझे अभी और पढ़ना है ,

तू खाना खा ले , मैं खा लूंगा ,

नहीं बेटा मैं इंतजार करूंगी, तू पढ़,


बच्चे के जिद के आगे मां की एक ना चली,


मां बैठ कर इंतजार करने लगी,

समय बीतता रहा ,रात गहराने लगी, लेकिन बच्चा पढ़ाई छोड़ नही रहा था,


और मां बिना खाए बैठी इंतजार कर रही है……….


समय गुजरा बच्चा बड़ा हुआ ,


अब उसके पास सारे ऐशोआराम है ,

पर आज भी मां फोन पे बेटा कब आएगा ,


मां मैं आ जाऊंगा तू खा ले,


नहीं बेटा तू जल्दी आ खाने का समय हो गया ,

नहीं मां अभी मैं बहुत जरूरी काम कर रहा हूं,

तू खा ले ,नहीं बेटा तू आ ,

मैं इंतजार कर रही हूं……

उम्मीद अभी बांकी है

हर हार के बाद.. तेरी जीत अभी बांकी है.. अभी बांकी है..


क्योंकि उम्मीद अभी बांकी है..
उम्मीद अभी बांकी है..


रात गहरी हो कितनी भी ..पर तेरी सुबह … अभी बांकी है ..

सुबह अभी बांकी है..


दर्द सहे है कितने तुमने…
कितने तुमने ..
उन दर्दों का हिसाब अभी बांकी है..
हिसाब अभी बांकी है..


क्योंकि उम्मीद अभी बांकी है..
उम्मीद अभी बांकी है..


तूने सजाए कई सपने है ..
कई सपने है..
इन सपने को पूरा करना बांकी है..
अभी बांकी है..


क्योंकि उम्मीद अभी बांकी है..
उम्मीद अभी बांकी है..

साथ देना हमारा

साथ देना हमारा ,
साथ देना हमारा..


जब आए मुसीबत..2
साथ देना हमारा ….2


अंधेरी रातों में जब ना दिखता हो कुछ भी.. 2,

अंगुली पकड़ना हमारा…2

साथ देना हमारा…2


बैठ जाऊं हार कर, जब कुछ आए न नजर …2

हौसला बढ़ाना हमारा…2


साथ देना हमारा…2


राह कांटो से भरी हो संग कोई ना हो…2


हाथ देना तुम्हारा ….

हाथ देना तुम्हारा…


साथ देना हमारा,
साथ देना हमारा।


जब तुमको लगे …
मैं गलत राह में हूं..2


राह दिखाना जरा सा ,
राह दिखाना जरा सा,


साथ देना हमारा ,साथ देना हमारा…

जीवन चक्र

क्लेश कष्ट करुणा
मरणासन्न बुढ़ापा तरुणा।

लू पेड़ छाया
कंचन काया माया।

सब्र विश्वास मीठा
बेसब्र अविश्वास तीखा।

नायक,जीवन कठिन

जीवन मृत्यु पलछिन्न।

अपमान अनादर प्रतिष्ठा
सत्य कर्म निष्ठा।

अविवेक क्रोध घमंड
अंत प्रलय तांडव।

भय घृणा,तृष्णा
अंत समय सब कृष्ण।

कौन हूं मैं ?

कौन हूं मैं मुझे किसकी तलाश है?


दिन है रात है ,

दिल में जज़्बात है,

फिर भी न जाने क्यों ?


कौन हूं मैं मुझे किसकी तलाश है?


रिश्ते हैं नाते है ,

और प्यार पाते हैं,

फिर भी ना जाने क्यों,


कौन हूं मैं मुझे किसकी तलाश है?


जानी अनजानी राहें है,


सपने ढेर सारे है।


फिर भी ना जाने क्यों?


कौन हूं मैं मुझे किसकी तलाश है?


मृत्यु है अमरता है,

प्रेम है समरसता है।


फिर भी ना जाने क्यों?


कौन हूं मैं मुझे किसकी तलाश है।


अंत है अनंत है, देव है संत है।


जड़ है चेतन है और आनंद है।


फिर भी ना जाने क्यों?


कौन हूं मैं मुझे किसकी तलाश है?

विश्व चेतना