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उलझन

किन उलझनों से गुजर रहा हूं
ये मैं जानता हूं
या

वक्त जानता है,

लोगों का क्या है

वो तो हमेशा मुस्कुराते देखते हैं।

रात अंधेरी और अनजान रास्ते
कैसे निकल रहा हूं ये मैं जानता हूं।

मैं वक्त के फितरत को जानता हूं मैं
वो कभी रुकता नहीं,वरना एक जख्म काफी था जिंदगी के लिए।

वक्त का उल्लू

वक्त का उल्लू देख रहा है,

तू जो जज्बातों से खेल रहा है
रात घनेरा दिन का राही ,

क्यों तू आंखे खोल रहा है,

वक्त का उल्लू देख रहा है।

तेरी करनी तेरी भरनी,

क्यों तू बीच में डोल रहा है।

वक्त का उल्लू देख रहा है।

उल्लू

रात दिन का रैन बसेरा
ये जो दिल खिलौना तेरा
क्यों तू इससे खेल रहा है।

वक्त का उल्लू देख रहा है।

तूने दिया किसको अपनापन

जो ये तुम खोज रहा है।

वक्त का उल्लू देख रहा है।

पागल

इक वो वक्त था और एक ये वक्त है मनवीर
तब भरी रहती थी,अब बचती नही!

जिंदगी का बीता हुआ दौर सबको सुहाना लगता है,

और सब उसको फिर से जीना चाहता है।

गए हुए वक्त को लाने के लिए सब परेशान रहते हैं,

इसीलिए तो मेरे दोस्त पागल समझते है।


प्यार

आजा थोड़ा आराम कर ले,
      जिन्दगी को थोड़ा प्यार कर ले।

वक्त तो नहीं तेरे पास ,
       लेकिन कुछ तो वक्त निकाल ले।

माना दुश्वारियां है बहुत ,
       पर तुझमें समझदारी भी है बहुत,
              कुछ तो समझदारी दिखा ले।

आजा थोड़ा आराम कर ले,
        जिन्दगी को थोड़ा प्यार कर ले।

मन को थोड़ा शांत कर,
         उससे थोड़ा बात कर।

अपने पीठ को थपथपा,
        खुद को शाबाशी दे ,
                 और हौसला बढ़ा।

आजा थोड़ा आराम कर ले,
        जिन्दगी  को थोड़ा प्यार कर ले।

दिल को दिल से लगा ,
         बात को यूं ना बढ़ा,
                दिल का तू ख्याल कर ले।

आजा थोड़ा आराम कर ले,
          जिन्दगी को थोड़ा प्यार कर ले।

साथ चल रहा हूं

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

तू मेरे साथ है यही सोच के
कभी तन्हा कभी महफ़िल
कभी कारवां के साथ निकल रहा हूं।

तेरे साथ कदम से कदम मिला कर चलने में
अब अंधेरों को भी पार कर रहा हूं।

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

तेरे साथ चलते चलते मेरा उम्र गुजर रहा है
मुझे ऐसा लगता है मेरा वक्त गुजर रहा है।

आस रहती है मन में तुझ से हमेशा आगे निकलने की
इसी जद्दोजहत में समय से पहले बूढ़ा हो रहा हूं।

तेरी मेरी दौड़ का सिलसिला जारी रहेगा ,
मैं अंत तक तुझे हराने की कोशिश करता रहूंगा।
कोशिश कितनी कामयाब होती हैं।
ये देखना तुझे भी है ये देखना मुझे भी है।

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

तेरे साथ चलने के इन कशमकश भरी रास्तों में
कुछ उजली कुछ काली रात लिए चल रहा हूं।

जिन्दगी का इक – इक पल लगा दिया
तेरे साथ चलने में ,तू समझे ना समझे मैं समझ रहा हूं।

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

तेरे साथ चलने का मैं क्या मोल चुका रहा हूं ?

ये तुझे क्या पता ,क्या मैं तुझे बता रहा हूं ?

फिर भी तुझे लगता है मैं खुशी – खुशी

चल रहा हूं ।

अगर अनजान मैं भी हूं तो अनजान तू भी है। लेकिन जानता तू भी है और जानता मैं भी हूं।

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

तेरे साथ चलते चलते कितने अपने हुए कितने बेगाने हुए
सब से मिलते बिछड़ते साथ चल रहा हूं!

तेरे साथ साथ दौड़ते ,चलते
कभी आगे निकलते
कभी छूटती ये सांसे
पर पता नहीं चलता तू मुझे पीछे छोड़ आया या मैं आगे निकल रहा हूं।

ऐ वक्त तेरे साथ चलते चलते
मेरे साथ कोई हो ना हो
उनकी यादें साथ रहतीं है।
उन्ही यादों का सहारा लिए
साथ चल रहा हूं।

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

लगता है तेरा मेरा रिश्ता है कई जन्मों का

इसलिए तो तू साथ छोड़े भी मैं फिर भी साथ आ रहा हूं।

तेरा मेरा दौड़ ये कब तक चलेगा ये नहीं मुझे पता ,तो क्या पता तुझे भी नहीं???

ऐ वक्त तेरे साथ चलने को
भरसक कोशिश कर रहा हूं
ऐसा लगता है कभी तू आगे और कभी मैं आगे निकल रहा हूं।

कौन कहे

बहुत दिनों तक शहर में रहने के पश्चात

एक लड़का अपने पिता से मिलने गाँव आया।

अपने पिता को मेहनत करते देख उसने सोचा थोडा पिताजी का हाथ बटाया जाए ।

और वह पिता के साथ  काम करने लग गया

लेकिन काम था कि खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।

दोपहर से शाम होने को आ रही थी ,धीरे – धीरे
अब रात होने को आ गई,

लेकिन अब भी कुछ काम बांकी था।

   दिन – रात के मेहनत से वह अब झल्ला सा गया था।

इतनी मेहनत कोई कैसे कर सकता है।

मैं तो इतने में ही परेशान हो गया हूं।

तो कोई  हर वक्त किसी भी मौसम में  इतना मेहनत कैसे  कर सकता है?

परेशान होते हुए बेटे ने अपने  बाप से पूछा,

तो बाप ने ज़बाब दिया –  किसान
और काम करने लगा।

इंतजार

तेरा इंतजार करते करते ही तो मेरा वक्त गुजरता है

तेरे बेसब्र नयनों ने कभी देखे हैं रास्ते जिनके,
उनके घावों पर मरहम भी नहीं,

क्या अब इंतजार का हक भी नहीं मुझको।

अब आग भी धधक के बुझने वाले है,
क्या अंतिम दीदार भी नहीं मुझको।

यूं तो बेरुखी की भी हद होती है,
तो क्या अब प्यार नहीं मुझसे।

तेरे बातों के ग़ज़ल ने क्या समा था बांधा,
तो क्या अब ग़ज़ल सुनने के काबिल भी नहीं।

वक्त के अंतिम हाशिए पर हूं,

तो क्या अब हाले खबर भी नहीं मेरी।

तेरा इंतजार करते करते ही मेरा वक्त गुजरता है।

कर्मरथ

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।
तू कर्म कर ,ना तू शर्म कर,
तू देख बस लोकहित,
मन में सेवाभाव हो।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तू शब्दभेदी तीर बन,
तू कर्म कर तू धिर बन।
तू बहते अश्क पोंछ डाल,
तू सत्कर्म रूपी बीज डाल,
तू आस्तिक बन, तू नास्तिक बन।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तेरे कर्म से तेरा भविष्य है,
तू कर्म पथ पर चलता रह।
तेरे नाम से जग को प्रकाश मिले,
तेरे कर्म से नया आयाम मिले।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तेरे द्वारा होना है, इस युग का भला।
तू चाहे तो बदल सकता है,

अपने जीवन की दशा।
वक्त के अंदर छिपा है ,

भविष्य तेरा,
तू मत देख बंदे कैसा है,
भविष्य तेरा।
तू निर्माता बन अपने भविष्य का,
तू कर्मवीर ,

तू रणवीर ,

तू धैर्यवान बन,
तू निर्माण कर स्वर्णिम युग का।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

लोगों की बातों पर ना ध्यान दे,

बस अपने कर्मो को ही मान दे,

सत्य से बस रख वास्ता।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को।

तेरे कर्म से तेरा भविष्य है,
तू कर्म पथ पर चलता रह।
तेरे नाम से जग को प्रकाश मिले,
तेरे कर्म से नया आयाम मिले।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तेरे द्वारा होना है,

इस युग का भला।
तू चाहे तो बदल सकता है,

अपने जीवन की दशा।
तू निर्माण कर स्वर्णिम युग का,
तेरे कर्म पे तेरा भविष्य टिका।

कर्म रथ पर हो सवार ,

तू जीत ले संसार को।

कुछ ऐसा करके जा बंदे,

वक्त को तू नहीं,

वक्त तेरा इंतजार करे।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

गुजर जाता है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।
जख्म कैसा भी हो ,

वक्त हर जख्म को भर देता है

मर्ज कैसा भी हो,

वक्त हर दर्द को हर लेता है।

नादानी कितनी भी हो,

वक्त हर चीज सीखा देती है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।

दिल के दर्द हो चाहे हो कोई बेरुखी,

वक्त हर लम्हा छुपा लेता है ।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।

इंतजार कैसा भी हो ,

वक्त हर चीज मिला देता है।

वक्त कैसा भी हो ,

कुछ पल में गुजर जाता है।

रात कैसा भी हो,

वक्त हर रात की सुबह लाता है।

दाग़ कितने भी हो,

वक्त हर दाग़ मिटा देता है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।

जिन्दगी में हो चाहे लाखों तुफां,

वक्त हर तुफां दबा देता है।

जख्म कैसा भी हो,

वक्त हर जख्म भर देता है

समय के नदी हर चीज बहा ले जाती है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है ।