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जब तन में ना रहे प्राण

अब कौन सा बंधन कौन सी माया,

जब तन में ना रहे प्राण।

अब कौन सिकंदर और किसका मान

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या हाथों की रेखा , क्या कर्म विधान

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या भाग्य का रोना ,और क्या है खोना

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या सुंदर क्या गोरा काला,और किस प्राणी से पड़ेगा पाला,

जब तन में ना रहे प्राण ।

क्या रेशमी क्या सूती कपड़े जो तूने दिन रात पहने, अब कैसी शर्म हया,

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या है माया क्या है काया छन में खाक भयो है भाया ,

अब क्या भोग विलास ,

जब तन में ना रहे प्राण।

बेजुबान

ना अरमां निकले ना तुफां निकले

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

होशियारी तो बहुत की,

जज्बातों से खेलने की,

जब देखा तो बस आह निकले,

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

रातों की खामोशी ,दिन की बैचैनी

इस दिल के कितने अरमां निकले,

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

गुनाह की खोज में हम खुद गुनहगार हो गए

जख्म ऐसे की दिल बे जुबां हो गए

क्या खोजने गए ,और क्या लेके निकले,

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

अपने पराए को छोड़, इस घर से बे निशां निकले,

छोड़ा जिस जगह को वो जगह ही अपना पता निकले,

ना अरमां निकले ना तुफां निकले

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

चाहत मुकद्दर थी,प्यार संसार था,

आंखों में कम पड़े आंसू, आंसुओ का क्या हिसाब निकले,

जो भी दिल से निकले बे जुबां निकले

उलझन

किन उलझनों से गुजर रहा हूं
ये मैं जानता हूं
या

वक्त जानता है,

लोगों का क्या है

वो तो हमेशा मुस्कुराते देखते हैं।

रात अंधेरी और अनजान रास्ते
कैसे निकल रहा हूं ये मैं जानता हूं।

मैं वक्त के फितरत को जानता हूं मैं
वो कभी रुकता नहीं,वरना एक जख्म काफी था जिंदगी के लिए।

जीना तो पड़ेगा ही

राह पथरीली हो या स्वर्ग से सुंदर चलना तो पड़ेगा ही
जिंदगी कितनी भी मुश्किलों से भरी हो जीना तो पड़ेगा ही।

रोते रोते हंसना है ये तो सीखना पड़ेगा ही
रिश्तों की उलझनों में उलझ कर रिश्तों को बचाना पड़ेगा ही।

चाहे बात कितनी भी बिगड़ जाए

बिगड़ी बातों को बनाना पड़ेगा ही।