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मनवीर के दोहे

मैं मुरख अति अज्ञानी,

तुम बिन कौन जाने स्वामी

सत्य की परख सत्य करे,

सत्य को कौन विचार।

सत्य –सत्य में भेद को ,

जाने सत्य आचार।

सेना युद्ध करे रण में,

असली युद्ध तो मन में।

नाच नचावे नटुआ

मन नचावे बटुआ

ऐसा सुबह कहां से लाऊं

अच्छे नहीं हालात दिल के

क्या जुगत लगाऊं
कैसे हो मिलन मनवीर
क्या क्या तौफे लाऊं।

जी के जिंदगी अपनी ना हुई
तो क्या मौत को गले लगाऊं।

सुंदर वचन , सुंदर चितवन
तो क्या सुंदरता का राग अलापु
रात और दिन का हो मिलन
ऐसा सुबह कहां से लाऊं

पागल

इक वो वक्त था और एक ये वक्त है मनवीर
तब भरी रहती थी,अब बचती नही!

जिंदगी का बीता हुआ दौर सबको सुहाना लगता है,

और सब उसको फिर से जीना चाहता है।

गए हुए वक्त को लाने के लिए सब परेशान रहते हैं,

इसीलिए तो मेरे दोस्त पागल समझते है।


चक्र

ये जन्म मृत्यु खेल ही तो है ,


एक माता के गर्भ से निकलना जन्म है,

तो दूसरे माता के गर्भ में जाना मृत्यु।


सत्य तो ये है ये भटकन कब तक है ये तो ईश्वर ही जाने ।


इस पूरे यात्रा को सब नहीं जान सकता,हम तो बस जन्म के बाद और मृत्यु से पहले की जानकारी रखते है।


बांकी यात्रा की जानकारी कैसे हो?
ये चक्र जो है कैसे टूटे?

(ये चक्र कैसा है जाने कोई
ज्ञानी,
मनवीर चिंता छोड़ के नाम की महिमा गाई)