ना अरमां निकले ना तुफां निकले
जो दिल से निकले बे जुबां निकले।
होशियारी तो बहुत की,
जज्बातों से खेलने की,
जब देखा तो बस आह निकले,
जो दिल से निकले बे जुबां निकले।
रातों की खामोशी ,दिन की बैचैनी
इस दिल के कितने अरमां निकले,
जो दिल से निकले बे जुबां निकले।
गुनाह की खोज में हम खुद गुनहगार हो गए
जख्म ऐसे की दिल बे जुबां हो गए
क्या खोजने गए ,और क्या लेके निकले,
जो दिल से निकले बे जुबां निकले।
अपने पराए को छोड़, इस घर से बे निशां निकले,
छोड़ा जिस जगह को वो जगह ही अपना पता निकले,
ना अरमां निकले ना तुफां निकले
जो दिल से निकले बे जुबां निकले।
चाहत मुकद्दर थी,प्यार संसार था,
आंखों में कम पड़े आंसू, आंसुओ का क्या हिसाब निकले,
जो भी दिल से निकले बे जुबां निकले
