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बेजुबान

ना अरमां निकले ना तुफां निकले

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

होशियारी तो बहुत की,

जज्बातों से खेलने की,

जब देखा तो बस आह निकले,

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

रातों की खामोशी ,दिन की बैचैनी

इस दिल के कितने अरमां निकले,

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

गुनाह की खोज में हम खुद गुनहगार हो गए

जख्म ऐसे की दिल बे जुबां हो गए

क्या खोजने गए ,और क्या लेके निकले,

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

अपने पराए को छोड़, इस घर से बे निशां निकले,

छोड़ा जिस जगह को वो जगह ही अपना पता निकले,

ना अरमां निकले ना तुफां निकले

जो दिल से निकले बे जुबां निकले।

चाहत मुकद्दर थी,प्यार संसार था,

आंखों में कम पड़े आंसू, आंसुओ का क्या हिसाब निकले,

जो भी दिल से निकले बे जुबां निकले

बेखबर

उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,


मैं मरने चला वो शहर को चली।


बहुत चाहते थे ,तुमको ए दिल,


ये दिल की लगी है ये मैं ही जानता हूं।


तुमको है क्या ,हंसी तुम बहुत थी,


मेरे दिल को पसंद तुम बहुत थी।


मगर इसी दिल को तुमने धोखा दिया,


तोड़ के मेरा दिल, तूने दिल कहीं और लगा लिया।


आज मेरा दिल फिर छलनी हुआ।


तूने खेला ऐसा खेल दिल जख्मी हुआ,


तेरी करतबों को लोग याद रखेंगे,


तूने जो किया उसे लोग याद रखेंगे।


अब अनजान बन गया तू सब कुछ करके,


तुझे भूल जाएंगे अपना सब कुछ खोके,


उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,
मैं मरने चला वो शहर को चली।

बहुत दिन हुए, तुझसे बात हुए, मुलाकात हुए……



आज फिर उस शहर में, मेरा आना हुआ,
उ नकी गलियों में फिर जाना हुआ।


ख़ामोश रास्ते उनकी गालियां थी ,सुनसान
जैसे उनके बिना सब थे वीरान ।


मैं चलता गया, दिल सिसकता रहा,

उनकी मुहब्बत का मैं, बस याद ले चला,


उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,
मैं मरने चला वो शहर को चली ।

दिल चाहता है

मैं सोचता हूं कुछ लिखूं तेरे बारे में
ये दिल है कि छुपाने को कहता है।

मैं चाहता हूं कि चिल्ला के कहूं सबसे
ये दिल है कि चुप रहने को कहता है।

मैं चाहता हूं हल्का हो दिल के बोझ
ये दिल है कि बोझ ढोने को कहता है।

मैं चाहता हूं ये गम और प्यार का इजहार करुं
ये दिल है कि दिल ही दिल में दबाने को कहता है।

मैं चाहता हूं युद्ध विराम करूं दिल का
ये दिल है कि घमासान चाहता है।