मनवीर के दोहे

आदर सब जगह होत है
ज्ञानी गुनी और संत।

अज्ञानी बन ज्ञान पा संतो के सानिध्य में

विपतकाल जब आएगा,

बिना ज्ञान तू पार ना हो पाएगा।

परमानंद आनंद है संत के संगत में
मनवीर रहा सोवत वहां तो
कैसे मिले परमानंद।

राही ये संसार है रहता है राहों पर,

चलना है तो चलो राही,

ध्यान रहे मंजिल पर।

निज गुण मत बखानिए,

मोल कम होत जात
ज्ञानी जाने सब है,

तू अपने मोल को जान।

रहत फकीरा मस्त है,
चिंता कुछो नाही,

ना जोरण केर चिंता ,जो मिले सो खाय।

कर्म विचार पगु धारिये,

होय सुफल सब काम,

बिना विचारे पगु धरे
काम नाम डुबाए।

कपड़े को कपड़ा पहनाए
बड़े ठाठ से बाहर जाए
अपने को पहचाने नाही
दूसरों की पहचान बताए।

कहे मनवीर सुन रे मन

तेरी अजब है चाल,

मैं बैठा तेरे बगल में,
तू क्यों खेल रचाए।

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