यात्रा

अनवरत चलने वाला यात्रा है ये

बस इक पराव से मोह किस हद तक उचित है।

हर बार की तरह इस बार भी जाना तो पड़ेगा ही।

अपनी छोटी बड़ी सोच से उपर उठना तो होगा ही।

रात कितनी भी गहरी क्यों न हो

सवेरा तो होगा ही।

तेरे चैतन्य में प्रकाश तो फैलेगा ही।

तू सत्कर्म में रत हो।

तेरे आनंद का कारण तू ही है।

तेरा आनंद कहीं बाहर नहीं है।

तू क्षणिक सुख के चक्कर में,

अपनी असीम आनंद को छोड़ रहा।

तू जब खुद को समझ ना पाया,

तो दूसरों को क्या समझेगा।

इसलिए

तू तेरा समझ मैं मेरा समझता हूं,

बस यही होने दे।

तेरे समझ में जब तू नहीं आएगा,

मेरे समझ में जब तक मैं नहीं आऊंगा,

सारी दुनिया को क्या खाक समझ पाऊंगा।

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