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मनवीर के दोहे

मैं मुरख अति अज्ञानी,

तुम बिन कौन जाने स्वामी

सत्य की परख सत्य करे,

सत्य को कौन विचार।

सत्य –सत्य में भेद को ,

जाने सत्य आचार।

सेना युद्ध करे रण में,

असली युद्ध तो मन में।

नाच नचावे नटुआ

मन नचावे बटुआ

प्रेम

जन्म, प्रेम , मृत्यु एक अटल सत्य है।


जन्म लेता है जीव और अपने ईश्वर से प्रेम करता है।


एवम अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है।


जन्म और मृत्यु आपके वश में नहीं ,


लेकिन प्रेम तो आपके वश में है ,


आपका प्रेम कैसा है

ये आपने अपने प्रेम को कितना समझा है ,

इसपर निर्भर करता है।


आप जिंदगी भर जिसकी तलाश करते है?


और जब अंत समय में जब आपको समझ मिलता है

तब आप मृत्यु के नजदीक रहते हैं ,

तो पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।


तब आप अपने आप को कोसते है ,

मैंने इतना समय इसको खोजने में लगा दिया।


प्रेम के वश में हैं भगवान,


जीव एक दुसरे से प्रेमवश जुड़ा रहता है।