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तेरे शहर में

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

लिखा तख्त पे अंदर आना मना है..

लिखा तख्त पे अंदर आना मना है..

मैं किस ओर जाऊं………

उधर जाना मना है…

मैं किस ओर जाऊं………

उधर जाना मना है…

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में..

तख्त

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

मैंने खोजा जिसे ओ शख्स आम न था..

जब मिला तो समझा.. ओ शहरी हो गया था

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में..

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

मैने सोचा था जैसा वैसा कुछ भी न पाया…

सब पैसा के पीछे इस कदर पड़े थे…

न अपना ख्याल न दिन का पता था…

मैने देखी नहीं इक भी तितलियां …

ना फूलों पे भंवरे …न नदी में कमल थे..

न नदी में कमल थे..

फूल

ऐसा लगता था सब.. कमाने गए थे..

ऐसा लगता था सब.. कमाने गए थे..

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में..

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

दिल चाहता है

मैं सोचता हूं कुछ लिखूं तेरे बारे में
ये दिल है कि छुपाने को कहता है।

मैं चाहता हूं कि चिल्ला के कहूं सबसे
ये दिल है कि चुप रहने को कहता है।

मैं चाहता हूं हल्का हो दिल के बोझ
ये दिल है कि बोझ ढोने को कहता है।

मैं चाहता हूं ये गम और प्यार का इजहार करुं
ये दिल है कि दिल ही दिल में दबाने को कहता है।

मैं चाहता हूं युद्ध विराम करूं दिल का
ये दिल है कि घमासान चाहता है।

मैं क्या कर सकता हूं?

स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामना के साथ

ए मातृभूमि तेरे लिए मैं क्या कर सकता हूं,

तेरे उपकारों का, क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मां मेरी मुझे इक मौका दे,

तेरे लिए मां अपनी शीश कटा सकता हूं।

ए मातृभूमि तेरे लिए मैं क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का ,क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मगर ए मां मैं चाहता हूं कुछ अलग करना,

इसके लिए मुझे चाहे कुछ भी पड़ जाए करना।

मां मैं चाहता हूं दुश्मनों के दांत खट्टे करना,

आंख उठाकर कोई देख ना पाए ,

तेरी ओर ,ऐसा काम करना चाहता हूं।

ऐ मातृभूमि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मां तेरे राहों के काटें निकालना चाहता हूं,

तेरे लिए मां, मैं इस जग को सुंदर बनाना चाहता हूं।

ऐ मातृभूमि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का क्या मैं बदला चुका सकता हूं?