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जब तन में ना रहे प्राण

अब कौन सा बंधन कौन सी माया,

जब तन में ना रहे प्राण।

अब कौन सिकंदर और किसका मान

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या हाथों की रेखा , क्या कर्म विधान

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या भाग्य का रोना ,और क्या है खोना

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या सुंदर क्या गोरा काला,और किस प्राणी से पड़ेगा पाला,

जब तन में ना रहे प्राण ।

क्या रेशमी क्या सूती कपड़े जो तूने दिन रात पहने, अब कैसी शर्म हया,

जब तन में ना रहे प्राण।

क्या है माया क्या है काया छन में खाक भयो है भाया ,

अब क्या भोग विलास ,

जब तन में ना रहे प्राण।

जीवन का खेल

जीवन है दो पल का

फिर भी कामना अनेकों है
ये तो खेल है जीवन का
कोई जान न पाया है ।

फिक्र है सारे जग की
पर जाने ना ये माया है।

सब करता मेरा मेरा

जो दो पल साया है।

अब बस भी कर दो मानव

क्या तेरा क्या मेरा है?

जीवन है दो पल का,

फिर भी कामना अनेकों है।
ये तो खेल है जीवन का
कोई जान न पाया है ।

माया

माया क्या है?

क्या हम सब इससे बंधे है?

क्या संसार सम्पूर्ण माया है ?

अब बात ये है कि हम माया को कैसे जाने?

इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।

की अगर कोई इंसान आपके अनुसार से कार्य नहीं कर रहा है,
तो मायावश आपको क्रोध आनी है।
अगर कोई आपका कार्य करे तो ,
या आपकी बड़ाई करे तो आप उसको पसंद करते है।

कोई आपका इज्जत करे तो आप खुश होते हो मायावश अच्छा अनुभव होता है।

यदि आपका कोई बुराई करे या आपकी बातों की अवहेलना करे तो मायावश आप उससे ईर्ष्या और द्वेष रखते हो।

आपको अपने मान अपमान का डर होता है ।

आपके लिए आपकी इज्जत ही सबसे बड़ी होती है ,
यही सब तो है माया – राग ,द्वेष ,प्रेम, घृणा ,क्रोध आदि ये सब माया के ही तो हथियार है।

और हमसब उसके शिकार है।

इसलिए तो कहते है जिसने माया का पार पाया उसके लिए मान और अपमान दोनों बराबर है।

आप उनका अपमान करो तो भी ठीक ,या आप उनको मान दो तो भी ठीक।

इनको पता है कि ये सब माया है,
और ये सब चलता रहेगा ।