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उलझन

किन उलझनों से गुजर रहा हूं
ये मैं जानता हूं
या

वक्त जानता है,

लोगों का क्या है

वो तो हमेशा मुस्कुराते देखते हैं।

रात अंधेरी और अनजान रास्ते
कैसे निकल रहा हूं ये मैं जानता हूं।

मैं वक्त के फितरत को जानता हूं मैं
वो कभी रुकता नहीं,वरना एक जख्म काफी था जिंदगी के लिए।

मेरी आवारगी मेरा निक्कमापन

मेरी आवारगी और मेरा निक्कमापन

यारों ये अब फितरत सी हो गई लगती है।

उनकी गलियों का चक्कर ,

यारों किस्मत सी हो गई लगती है।

जो भी देखता आवारा समझता है,

क्या आपने भी आवारा समझ लिया ।

आपके खातिर ही ये फितरत बनी,

आप की चाहत ने ही निक्कमा किया।

शायद किसी दिन समझोगे इस बात को

मेरी आवारगी और मेरा  निक्कमापन