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जीवन का खेल

जीवन है दो पल का

फिर भी कामना अनेकों है
ये तो खेल है जीवन का
कोई जान न पाया है ।

फिक्र है सारे जग की
पर जाने ना ये माया है।

सब करता मेरा मेरा

जो दो पल साया है।

अब बस भी कर दो मानव

क्या तेरा क्या मेरा है?

जीवन है दो पल का,

फिर भी कामना अनेकों है।
ये तो खेल है जीवन का
कोई जान न पाया है ।

जीवन चक्र

क्लेश कष्ट करुणा
मरणासन्न बुढ़ापा तरुणा।

लू पेड़ छाया
कंचन काया माया।

सब्र विश्वास मीठा
बेसब्र अविश्वास तीखा।

नायक,जीवन कठिन

जीवन मृत्यु पलछिन्न।

अपमान अनादर प्रतिष्ठा
सत्य कर्म निष्ठा।

अविवेक क्रोध घमंड
अंत प्रलय तांडव।

भय घृणा,तृष्णा
अंत समय सब कृष्ण।