क्या कहूं
किस बात की दुहाई दूं
दिल जिगर जान की
या तेरे फरमान की।
क्या कहूं?
किस बात की बधाई दूं
पुराने गहरे जख्म की
या नए बने घाव की।
क्या कहूं?
क्या क्या दर्द दिखाऊं
अपनी आजादी की
या अपनी गुलामी की
क्या कहूं
किस बात की दुहाई दूं
दिल जिगर जान की
या तेरे फरमान की।
क्या कहूं?
किस बात की बधाई दूं
पुराने गहरे जख्म की
या नए बने घाव की।
क्या कहूं?
क्या क्या दर्द दिखाऊं
अपनी आजादी की
या अपनी गुलामी की
आजादी तो आजादी होती है दोस्तों
मगर जिसने संस्कार में गुलामी पाया हो
उसके लिए आजादी क्या ?
आजादी के परवाने आजादी के लिए क्या कर नहीं गुजरते,
लेकिन जो जन्म से ही बंधा हो, उसके लिए आजादी क्या ?
अक्सर इस दुनिया में बिरले ही मिलते हैं आजाद,
जो जान बूझ कर बंधन में बंधे हैं,
उसके लिए आजादी क्या ?
इस फरेबी संसार से तू
ऐसे मत जुड़ जाना
जब आए तेरी आजादी
उड़ना मत भूल जाना।
जिन्दगी की इस दौड़ में
संतुलन बनाए रखना ,या बड़ा बनके
खुद को खुदा मत समझना,
जब आए तेरी आजादी
उड़ना मत भूल जाना।
आग भी राख होती है ,
जिन्दगी के भी शाख होते है,
शाखों में उलझ कर खुद को हराभरा न समझना।
जब आए तेरी आजादी
उड़ना मत भूल जाना।
तेरा किरदार तुझे निभाना है
ये जीवन को जी के जाना है,
अपने किरदार में खुद को ना भूल जाना,
जब आए तेरी आजादी
उड़ना मत भूल जाना।
ये जीवन का पहेली ,
उलझाना इस का काम।
इस जीवन के पहेली में
तुम ना उलझ जाना,
जब आए तेरी आजादी
उड़ना मत भूल जाना