इंसान

तू इंसा है, तू ही इंसा है
तू हिम्मत है,

तू ही जज्बा है,
तू तुफां है ,

तू ही शांति है।
तू इंसा है ,तू ही इंसा है ।

तू आदि है ,

तू ही अनंत है।

तू क्रोधी है ,

तू ही संत है।

तू इंसा है ,तू ही इंसा है।

तुझ से ये सारा जहां ,

तेरे बिना कुछ नहीं यहां।

तू बर्बादी है,

तू ही आबादी है।

तू इंसा है ,तू ही इंसा है।

भूख

उसने दो दिनों से कुछ भी नहीं खाया था ।

अब कोई काम भी नहीं मिल रहा था ।

अब उसके पास एक रुपया भी नहीं था ,

बड़ा ही स्वाभिमानी था, कभी किसी से कुछ मांगता नहीं था ।

बिना कुछ काम किए वह किसी का कुछ भी नहीं लेता था।

उसमें ईमानदारी कूट कूट कर भरी थी।

आज तक किसी को कुछ भी कहने का मौका नहीं दिया था।

लेकिन आज जब वो दो दिन से भूखा है ,

कोई स्वाभिमान और ईमानदारी काम नहीं आ रही थी।

स्वाभिमान उसे मांगने से रोकती थी,

और ईमानदारी उसको किसी भी तरह के अनैतिक कार्य करने से रोक रही थी।

हर आने जाने वाले की ओर एक बार देखता और बिना कुछ बोले अपना सिर झुका लेता ,

जैसे कोई बड़ा गुनाह किया हो……

क्या इस तरह कोई उसकी मदद करेगा ?

या भूख से वो मर जाएगा ?

और स्वाभिमान की वजह किसी से कुछ बोलेगा नहीं

तो उसकी मदद करेगा कौन ?

या भूख से वो मर जाएगा ?.…………..

अच्छी आदतें

आदतें इंसान को बेहतरीन बना देती है ,
आदतें जो बनते अच्छे ,

आपको अच्छा बना देती है ।

चाहे हर कोई पाना मंजिल को ,

दोस्तों,
चाहे हर कोई पाना मंजिल कोपर मंजिल मिलता उसी को ,

जो आदतें अच्छी बना लेते हैं ,

जो आदतें अच्छी बना लेते हैं ।

आदतें इंसान को बेहतरीन बना देती है।

जिन्दगी में चाहे हर कोई आजादी,दोस्तों,

जिन्दगी में चाहे हर कोई आजादी पर आजादी भी उसी ने पाया ,

अपनी गंदी आदतों से जो,दूरी बना लेते हैं।

आदतें इंसान को बेहतरीन बना देती है ।

बदलते अक्सर रातों को करवटें ,

दोस्तों,

बदलते अक्सर रातों को करवटें,

आदतें जो अपनी गंदी बना लेते हैं ।

आदतें इंसान को बेहतरीन बना देती हैं।

अक्सर उनको बिस्तर पर जाते ही नींद आ जाती है,

दोस्तों,

अक्सर उनको बिस्तर पर जाते ही नींद आ जाती हैजो अपनी आदतों को मेहनती बना लेते हैं ,

जो अपनी आदतों को मेहनती बना लेते।

आदतें इंसान को बेहतरीन बना देती है ।

अक्सर शरीरें जबाव देने लगती वक्त से पहले,

दोस्तों,

अक्सर शरीरें जबाव देने लगती वक्त से पहले,

आदतें जिनको अंधा बना देती हैं,

आदतें जिनको अंधा बना देती हैं।

आदतें इंसान को बेहतरीन बना देती है।दोस्तों,

गंदी आदतें हमें शुरू में मजा ,

अंत में सब दिन के लिए रोगी बना देती है।

अच्छी आदतें शुरू में मेहनती ,

अंत में सब दिन के लिए सुखी बना देती है।

और अंत में दोस्तों,

अच्छी आदतें हमें अपनाना है या ना अपनाना है खुद पर निर्भर है ,

वरना

जिन्दगी तो हर हाल में कटा
करती है,

जिन्दगी तो हर हाल में कटा
करती है।

जिद

गुस्से में आकर उसने अपना घर छोड़ तो दिया ,लेकिन
ना तो उसको बोलने का सलीका था, और ना ही वह सीधा मुंह किसी से बात करता था।
सभी कहते थे मा बाप के लाड प्यार ने उसको बिगाड़ दिया था।
घर से बाहर वह अकेले पहली बार निकला था, उसके मन में गुस्सा भरा था ।
और वह बिना कुछ सोचे समझे चला जा रहा था।

उसके घर से निकलते वक्त उसके जेब में एक हजार रूपए मात्र थे।
रास्ते भर सोच रहा था मुंबई जाऊंगा ,मगर उसके पास पैसे बहुत कम थे,
इससे पहले वह अपने मां और पिताजी के साथ मुंबई और कोलकात्ता घूमने गया था , जिससे उसको इतना तो पता था कि मुंबई महगां शहर है, और कलकत्ता सस्ता शहर है।

इसलिए उसने कोलकात्ता जाने का निश्चय किया , और कोलकात्ता का टिकट लेकर ट्रेन में बैठ गया।
कोलकाता पहुंचने पर कुछ दिन इधर – उधर भटकता रहा। दिन और रात को किसी सस्ते से ढाबे पर जाकर खाना खाता और किसी मंदिर के पास या किसी रेलवे स्टेशन पर जाकर सो जाता। पैसे अब ख़तम होने वाले थे ,
और अब उसे अपने घर की याद आने लगी थी। मां और पिताजी की याद आने लगा था।
लेकिन जब जब घर की याद आती तब तब उसे अपने फैसले की याद आ जाती ,की वह क्या कहकर घर से निकला है ,की वह अपने पैर पर खड़ा होकर आएगा,
या तो नहीं आएगा ।

अपनी ही जाल में खुद उलझ चुका था,
कोई काम जानता नहीं था।
अब करे तो क्या करे?
उसने सोचा बिना काम किए तो अब जीना भी मुश्किल हो जाएगा।
इसलिए उसने कुछ भी काम करने की ठानी,
और निकल पड़ा काम की तलाश में,
हर तरह के दुकान में गया ,लेकिन बिना गारंटी के कोई भी काम देना नहीं चाहता था।
अब उसके जेब में मात्र 100 रुपए बचे थे जिसमे ना तो वह घर जा सकता था और ना ही दो दिन से ज्यादा खाना खा सकता था ,आज सुबह वह काम की तलाश में बिना खाए ही निकल गया , लेकिन काम नहीं मिला, दिन के 12 बजे तक उसने काम के तलाश में इधर – उधर हाथ पैर मारता रहा ,लेकिन कोई काम नहीं मिला ,अब उसने सोचा जब तक पैसा कमाना शुरू नहीं कर दूंगा , खाना नहीं खाऊंगा।
दोपहर में उसने पानी पी कर काम चलाया।
और फिर काम की तलाश में लग गया, एक जगह काम मिला भी लेकिन वह काम उसके वश का नहीं था,
बहुत ही भारी गट्ठर को उठा कर एक जगह से दूसरे जगह पर रखना था।
दूसरा दिन भी ऐसे ही गुजर गया था ,बिना खाए एक दिन गुजर गया ,सुबह हुई पानी पीकर फिर काम के तलाश में निकल गया,
आज तो किसी भी हाल में उसको काम ढूंढना था, क्योंकि काम से पैसा मिलेगा तब तो उससे खाना खाएगा, उसकी भूख से हाल बेहाल था ।
उसे बार बार अपने परिवार की याद आती की कैसे खाना में थोड़ा सा भी देरी नहीं होता था, और थोड़ा भी देरी होने पर सब उसको मनाने में लग जाते थे।
आज उसे पूरे एक दिन हो गए थे।
खाना खाए ,लेकिन कोई पूछने वाला नहीं था।
काम की तलाश करते करते वहबहुत दूर निकल चुका था ,
दोपहर हो चुकी थी ,अब भूख और प्यास और जोर से लगने लगी ।
वह छायादार जगह की तलाश करने लगा जहां उसको पानी के साथ आराम करने की जगह भी मिले ,ऐसा ही जगह उसको मिल भी गया वह आम और नींबू का बागान था , वहीं पास में चापाकल था, वहीं उसने पानी पिया और आराम करने लगा,
और भी आदमी वहां आराम कर रहे थे ,उस छायादार जगह में
आपस में बात चीत भी कर रहे थे
वहां नींबू भी बिक रहा था ,आम भी बिक रहा था
नींबू और आम वहां बहुत ही सस्ते में मिल रहे थे,तभी उसके मन में ख्याल आया कि क्यों न इसको बेचने का काम किया जाए ,
लेकिन उसके पास मात्र 100 रूपए ही थे ,दोनों के दाम पता करने पर नींबू बहुत सस्ता लगा ,शहर में 10 का 2 देता है
और यहां 10का 10 उसने सोचा नींबू ही खरीदा जाए , और शहर में बेचा जाए।
इतना सोचने के बाद वह नीबू वाले के पास गया और नींबू का दाम करने लगा पहले तो नींबू वाले को लगा ,
की 1या 2 खरीदेगा ,जब उसने कहा 100 लूंगा तो कहा ठीक है ,75 पैसे का 1 लगा दूंगा ।
इस पर वह मान गया,
और एक प्लास्टिक का बैग भी दे दिया और उसमे 100 नींबू भर दिया , भूख के कारण उसको चला भी नहीं जाता था ,लेकिन उसने मन में ठान लिया था जब तक पैसा कमाऊंगा नहीं खाऊंगा नहीं ।

उसके भूख ने उसको बेचना सीखा दिया ,नींबू बेचने में उसने अपनी पूरी ताकत झोंक दी।
पूरे दिन घूम घूम कर उसने 99नींबू बेच दिए
वहां लोग 10 में 2 देते थे और ये 10 में 3 देने लगा। रात तक उसने लगभग सारे नींबू को बेच दिया।
इस तरह उसने अपने जिन्दगी की पहली कमाई की ,जिसमें उसको फायदा भी हुआ 75 का 333 रात को उसने खाना खाया , और अगले दिन के लिए योजना तैयार करने लगा ,की कल उसको क्या करना है,
दूसरे दिन वह सवेरे वहां नींबू लेने पहुंच गया ।
आज वह 150 रूपए का नींबू का खरीदा 200 जिसमें 100 नींबू सुबह से दोपहर तक और बचे नींबू दोपहर को खाना खाने के बाद रात तक घूम – घूम कर बेच दिया। इस बार भी उसको फायदा हुआ फिर अगले दिन वह लग गया काम में
इस बार वह सुबह से ही नींबू बेचने लगा शाम तक उसने लगभग पूरे नींबू को बेच दिया आज भी उसको 4 गुना से जायदा का फायदा हुआ।
अब उसको थोड़ा – थोड़ा भरोसा अपने उपर होने लगा था। की वह अब कुछ कर सकता है।

अब उसने 10 दिन तक रोज जगह बदल बदल कर नींबू बेचा।
अब उसके पास कुछ पैसे जमा हो गए थे, और कुछ जान पहचान भी हो गई थी , जिसके वजह से उसको रहने के लिए खोली मिल गई।
इस तरह से रोज वह मेहनत करने लगा कुछ दिनों के बाद उसने एक ठेला ले लिया और अब उसने नींबू के साथ खेत से कुछ ताजी सब्जी भी रखने लगा ….…………..

कर्मरथ

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।
तू कर्म कर ,ना तू शर्म कर,
तू देख बस लोकहित,
मन में सेवाभाव हो।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तू शब्दभेदी तीर बन,
तू कर्म कर तू धिर बन।
तू बहते अश्क पोंछ डाल,
तू सत्कर्म रूपी बीज डाल,
तू आस्तिक बन, तू नास्तिक बन।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तेरे कर्म से तेरा भविष्य है,
तू कर्म पथ पर चलता रह।
तेरे नाम से जग को प्रकाश मिले,
तेरे कर्म से नया आयाम मिले।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तेरे द्वारा होना है, इस युग का भला।
तू चाहे तो बदल सकता है,

अपने जीवन की दशा।
वक्त के अंदर छिपा है ,

भविष्य तेरा,
तू मत देख बंदे कैसा है,
भविष्य तेरा।
तू निर्माता बन अपने भविष्य का,
तू कर्मवीर ,

तू रणवीर ,

तू धैर्यवान बन,
तू निर्माण कर स्वर्णिम युग का।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

लोगों की बातों पर ना ध्यान दे,

बस अपने कर्मो को ही मान दे,

सत्य से बस रख वास्ता।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को।

तेरे कर्म से तेरा भविष्य है,
तू कर्म पथ पर चलता रह।
तेरे नाम से जग को प्रकाश मिले,
तेरे कर्म से नया आयाम मिले।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

तेरे द्वारा होना है,

इस युग का भला।
तू चाहे तो बदल सकता है,

अपने जीवन की दशा।
तू निर्माण कर स्वर्णिम युग का,
तेरे कर्म पे तेरा भविष्य टिका।

कर्म रथ पर हो सवार ,

तू जीत ले संसार को।

कुछ ऐसा करके जा बंदे,

वक्त को तू नहीं,

वक्त तेरा इंतजार करे।

वक्त पर मत छोड़ बंदे,
अपने भविष्य को ।

गुजर जाता है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।
जख्म कैसा भी हो ,

वक्त हर जख्म को भर देता है

मर्ज कैसा भी हो,

वक्त हर दर्द को हर लेता है।

नादानी कितनी भी हो,

वक्त हर चीज सीखा देती है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।

दिल के दर्द हो चाहे हो कोई बेरुखी,

वक्त हर लम्हा छुपा लेता है ।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।

इंतजार कैसा भी हो ,

वक्त हर चीज मिला देता है।

वक्त कैसा भी हो ,

कुछ पल में गुजर जाता है।

रात कैसा भी हो,

वक्त हर रात की सुबह लाता है।

दाग़ कितने भी हो,

वक्त हर दाग़ मिटा देता है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है।

जिन्दगी में हो चाहे लाखों तुफां,

वक्त हर तुफां दबा देता है।

जख्म कैसा भी हो,

वक्त हर जख्म भर देता है

समय के नदी हर चीज बहा ले जाती है।

वक्त कैसा भी हो,

कुछ पल में गुजर जाता है ।

अपनापन

।कोई बांझ तो कोई कुलटा और कोई अभागी कहकर बुलाती थी।कोई कहती सुबह सुबह किसका मुंह देख लिया,आज तो पूरा दिन ही खराब जाएगा।
घर से निकलना मुश्किल कर दिया था,किसी भी वजह से घर से बाहर जाना होता तो सबसे बचके निकलती ,फिर भी कोई ना कोई टकरा ही जाती और उसको ताना सुनना पड़ता इसलिए वह घर से ना ही निकलती थी।
अचानक क्या हुआ ऐसा की समाज के रंग बदल गए?

शादी के करीब दस सालों के बाद उसके घर में किलकारी गूंजी
उसके घर एक सुंदर बच्चे का जन्म हुआ, आखिरकार भगवान ने उसकी और उसके परिवार की सुन ली।
बच्चे के जन्म से पूरा परिवार खुश था।
मां तो अपने बच्चे को देख -देख कर निहाल हो रही थी ।
बीच बीच में उसे अपना बिता हुआ कल भी याद आ जाता था
इक पल में अभी मिली खुशी के आंसू और दूसरे पल में पीछे हुए दुखों के याद में आंसू,
ये आंसू थे कि रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, पूरा परिवार उसको चुप कराने में लगा था। कभी कभी पूरा परिवार उसके साथ रोने लगता था ।अपने पूरे परिवार को रोता देख उसने अपने आप को किसी तरह चुप किया । और अपने परिवार के बारे में सोचने लगी ।आज अगर उसका परिवार उसके साथ नहीं होता तो वह मर गई रहती समाज के तानों से उसने कई बार अपने आप को मारने की कोशिश की
उसके परिवार ने उसको बार बार समझा कर उसको अपनेपन का अहसास कराया और उसको हिम्मत दिया। और इसलिए आज सभी लोग उसे बधाई दे रहे थे। जो कल तक ताना मारते थे ,वो भी आज घर आकर बधाईयां दे गए

प्रेरणा :-१) धैर्य हर परिस्थिति में रखना जरूरी है।

२) समाज का क्या है अगर आप कुछ करते हो तो भी बोलेंगे,
और कुछ नहीं करोगे तब भी बोलेंगे। समाज को तो बस समझने की देरी है ।अगर आप गलत करते हो तो भी बोलेंगे ,अगर आप सही करते हो तो भी बोलेंगे ,अगर आप कुछ अचीव करोगे तो सेलिब्रेट करने भी आएंगे।नहीं बुलाओगे तो भी बोलेंगे ,बुलाओगे तो भी बोलेंगे।

३) परिस्थिति कैसा भी हो परिवार अगर साथ दे तो किसी भी मुसीबत से पार पाया जा सकता है।

उन्हें क्या पता

तेरे दर्द से परेसां हूं मैं !

ऐसा लगता है कि बिमार हूं मैं!!

मेरी खामोशी का मतलब ना निकालना!

तुम्हे क्या पता,

मतलब निकालने में माहिर हूं मैं!!

तुम्हे पसंद नहीं मेरा आना!

पर तुम्हे क्या पता ,

घर से भागने में माहिर हूं मैं!!

यूं ना दिल जलाओ मेरा !

तुम्हे क्या पता,

परवाना , जलने में माहिर हूं मैं !!

मैंने जब भी तुम्हे देखा तुम मुस्कुराने लगी !

तुम्हे क्या पता,

सपने सजाने में माहिर हूं मैं!!

दर्द उठता है तेरे जाने के नाम से!

तुम्हे क्या पता,

दर्द छुपाने में माहिर हूं मैं!!

अक्सर डराते है लोग मुझे प्यार के नाम से!

उन्हें क्या पता ,

धोखा खाने में माहिर हूं मैं!!

रातों के अंधेरे में अक्सर खोजता हूं चांद को !

आपको क्या पता,

अंधेरों में खोजने में माहिर हूं मैं!!

अक्सर चलते चलते रुक जाता हूं मैं!

,तुम्हे क्या पता,

मन ही मन योजना बनाने में माहिर हूं मैं !!

मुझे डराते है , वही जो डरपोक हैं!

उन्हें क्या पता ,

पेड़ की पत्तियां तोड़ने से भी डरता हूं मैं !!

अक्सर मेरा मुकाबला होता है मुझसे !

मुझे ही है पता है,

कि मेरे मैं से लड़ता रहता हूं मैं!!

दिल के जज़्बात से अक्सर हार जाता हूं मैं!

दिल को क्या पता,

उनसे कितना प्यार करता हूं मैं!!

मैं अक्सर सीधा चलने की कोशिश करता हूं!

पांव को क्या पता,

रास्ते है की अक्सर मूड़ जाते हैं!!

मां

तेरी बातें तेरा प्यार मां मैं न भुला पाता हूं,
अकसर अकेले में छुप- छुप के रोता रहता हूं।
तू है तो जहां मेरे लिए बस खेला है
तू नहीं तो ये दुनियादारी झमेला है।
तेरे रहने से ना जाने कहां से आती है इतनी ताकत !
तेरे इक जाने के अहसास से खुद को अकेला पाता हूं।
तेरी बातें तेरा प्यार मां मैं न भुला पाता हूं।
अकसर अकेले में छुप -छुप के रोता रहता हूं।
मेरे इक जिद के लिए ,
अपने वर्षों के जमा पूंजी को एक पल में लुटाती हो ।
मां मैं कितना भी बड़ा क्यों न हो जाऊं ,तेरे लिए तो तेरा छोटा बच्चा हूं।
तेरी बातें तेरा प्यार मां मैं न भुला पाता हूं।
अकसर अकेले में छुप- छुप के रोता रहता हूं।

परछाई

ढलते सूरज को देखती है और वो फिर चलने लगती है ,उसके चाल में अजब खामोशी और तेजी है। अपने बच्चे को गोद में उठाए पसीने से लथपथ चली जा रही है।कभी अपने छोटे बच्चे को गोदी में संभालती और कभी अपने आंचल से पसीने को पोछती और फिर तेजी से चलने लगती ।
अचानक किसी ने पीछे से आवाज लगाई , मां उफ्फ! धीरे धीरे चलो न, मैं इतना तेज नहीं चल पा रहीं हूं।
मां ने उसकी बात को अनसुना किया और तेजी से आगे बढ़ने लगी ,उसके पीछे बच्ची जो सही से चल नहीं पा रही थी। मां की तेजी देख कर वह उसके पीछे दौड़ने लगी।

चाहत

अब आसमां की चाहत भी पूरी हो गई,

अब आसमां की चाहत भी पूरी हो गई,
उस देखना था जो ये हंसी जहां।
उसके किस्मत में था हर दिन दीदार लिखा,
लेकिन तूने तो उसे उसके किस्मत से दूर कर दिया।अब जाके इक बार फिर से उस की दुआ रंग लाई
अब जाके इक बार फिर से उस की दुआ रंग लाई ।जिसने तेरे चेहरे की रंगत उड़ाई
तू अब कैद में है और वो मौज में है।
तेरी लालसा ही तेरा काल बन गया है,
और तू देख इस जहां को कितनी बेहतरीन बन गई है।
जिसके चेहरे पर कभी झुर्रियां थी
वही अब कितनी हसीन बन गई है।
रात का दीदार ना रात को होता था,
रात के वो तारे जिन्हें सब भूल सा गए थे,
आज अचानक प्रकट हो गए है।
जिनकी आवाज सुनने को कान तरस गए थे,
आज उनकी आवाज सब सुन रहे है।
आज अधूरी ख्वाहिशें पूरी हो रही है,
जो समझ रहे थे कल तक अपने आपको खुदा !
आज वो भी सहम रहें है,
आज वो भी सहम रहें है।अब जाके इक बार फिर से उस की दुआ रंग लाई,अब जाके इक बार फिर से उस की दुआ रंग लाई।

मत देख इधर

मत देख इधर
मत देख इधर ए वक्त सफर
मैं तेरे साथ ही तो हूं।
तू वक्त का दरिया है और मैं नाव ही तो हूं।
तेरे साथ ही मेरी जिंदगी है ,तेरे बिना तो मैं कुछ भी नहीं।
तुमको लगता है मैं किनारे से निकल जाऊंगा,
जब की तेरे बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
मत देख इधर ए वक्त सफर,
मैं तेरे साथ ही तो हूं।
जब तुमको लगता है मैं तेरे से आगे निकल जाऊंगा,
तो ऐसा है की मैं आगे जाकर भी कहां जाऊंगा।
मुझको रहना है, तेरे साथ ही
क्योंकि तू है, तो मैं हूं।
मत देख इधर ए वक्त सफर
मैं तेरे साथ ही तो हूं।
तेरे अंत खोजने में में खुद अंत हो जाता हूं,
इसलिए तो तेरे इस अंतहीन यात्रा पर खुद को तुझ से घिरा पाता हूं।
तेरे से मैं अलग नहीं ,ना कभी अलग हो पाता हूं।
मत देख इधर ए वक्त सफर
मैं तेरे साथ ही तो हूं।
लोग कहते हैं हमेशा वक्त के साथ चल,लेकिन कौन है वो जो बिना वक्त के चलता है।
वक्त वो दरिया है जिसमें सबको बहना है ,इसी के साथ तो मिलती है सबको मंजिलें।
और जो कहता है कि वक्त से हमेशा आगे रह,
तो क्या आगे वक्त नहीं ।
मत देख इधर ए वक्त सफर
मैं तेरे साथ ही तो हूं।

विश्व चेतना