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तू रूप है

तेरा वजूद है कोई मिलान नहीं
तू सब में है पर कोई नाम नहीं।

संग तू है पर संग नहीं,

रंग है तू पर रंग नहीं।

तू रूप है पर तेरा कोई रूप नही,

नजरंदाज कर दूं तुझे
पर ऐसी कोई बात नहीं।

जीवन का खेल

जीवन है दो पल का

फिर भी कामना अनेकों है
ये तो खेल है जीवन का
कोई जान न पाया है ।

फिक्र है सारे जग की
पर जाने ना ये माया है।

सब करता मेरा मेरा

जो दो पल साया है।

अब बस भी कर दो मानव

क्या तेरा क्या मेरा है?

जीवन है दो पल का,

फिर भी कामना अनेकों है।
ये तो खेल है जीवन का
कोई जान न पाया है ।

अब उन्हें तन्हाई चाहिए!

अब उन्हें तन्हाई चाहिए ,

अब उन्हें तन्हाई चाहिए,

समझ लो उन्हें तेरी जरूरत है।

क्या वक्त भी ठहर सा गया है
या ये पल कट ही नहीं रहा है।

मैंने जो समझा है क्या उन्होंने ये जाना है,

तंग मन की गलियां है और बाहर सारा जमाना है।

क्या बात है की उन्हें तन्हाई चाहिए?

मेरे सब्र का नाफरमानी चाहिए।

क्या उन्होंने बदला लेने की ठानी है,

क्या उन्होंने बदला लेने की ठानी है,

उनके खातिर पेश ये मेरी जिंदगानी है
उनके खातिर पेश ये मेरी जिंदगानी है

शुभकानाएं

सुकून

ए मेरे दिल के सकून,
मैं तुझसे क्या उम्मीद करूं,
इस बिगड़ती माहौल में,
तेरे साथ चैन से रह पाऊंगा।
या तू भी साथ छोड़ देगा,
मेरे ख्वाब की तरह।
तुझे खोने के डर से छिपता फिरता हूं।
और तू जाने को तैयार है,
मौसम की तरह।

उन्हें क्या पता

तेरे दर्द से परेसां हूं मैं !

ऐसा लगता है कि बिमार हूं मैं!!

मेरी खामोशी का मतलब ना निकालना!

तुम्हे क्या पता,

मतलब निकालने में माहिर हूं मैं!!

तुम्हे पसंद नहीं मेरा आना!

पर तुम्हे क्या पता ,

घर से भागने में माहिर हूं मैं!!

यूं ना दिल जलाओ मेरा !

तुम्हे क्या पता,

परवाना , जलने में माहिर हूं मैं !!

मैंने जब भी तुम्हे देखा तुम मुस्कुराने लगी !

तुम्हे क्या पता,

सपने सजाने में माहिर हूं मैं!!

दर्द उठता है तेरे जाने के नाम से!

तुम्हे क्या पता,

दर्द छुपाने में माहिर हूं मैं!!

अक्सर डराते है लोग मुझे प्यार के नाम से!

उन्हें क्या पता ,

धोखा खाने में माहिर हूं मैं!!

रातों के अंधेरे में अक्सर खोजता हूं चांद को !

आपको क्या पता,

अंधेरों में खोजने में माहिर हूं मैं!!

अक्सर चलते चलते रुक जाता हूं मैं!

,तुम्हे क्या पता,

मन ही मन योजना बनाने में माहिर हूं मैं !!

मुझे डराते है , वही जो डरपोक हैं!

उन्हें क्या पता ,

पेड़ की पत्तियां तोड़ने से भी डरता हूं मैं !!

अक्सर मेरा मुकाबला होता है मुझसे !

मुझे ही है पता है,

कि मेरे मैं से लड़ता रहता हूं मैं!!

दिल के जज़्बात से अक्सर हार जाता हूं मैं!

दिल को क्या पता,

उनसे कितना प्यार करता हूं मैं!!

मैं अक्सर सीधा चलने की कोशिश करता हूं!

पांव को क्या पता,

रास्ते है की अक्सर मूड़ जाते हैं!!

रुक मत

हम चलते है बिना थके ,

कभी धूप में कभी छांव में ।

हम चलते है बिना थके,

कभी धूप में कभी छांव में

हमें रोकते ये जहां, हमें टोकते है ये जहां।
फिर भी हम चलते है बिना रुके,

कभी धूप में कभी छांव में।

कभी धूप में कभी छांव में।

क्योंकि भविष्य हमें है देख रहा
और है हमसे ये कह रहा
पथ पर कांटे हो चाहे लाख बिछे।
तू रुक जाना नहीं, तू झुक जाना नहीं।
तू संभल के चल ,तू देख के चल
क्योंकि तेरा जिन्दगी है चलना ।

इसलिए तो हम चलते है बिना थके

कभी धूप में कभी छांव में।

कभी धूप में कभी छांव में।

हमे रोकती है वक्त का ये फासला,
हमें रोकती है उम्र का ये सिलसिला।
हमें रोकोगी तुम भी कभी ना कभी,
क्योंकि तुम्हें डर है मेरे हारने का मेरे रुकने का।
और मुझे हौसला है जीतने का, और मुझे हौसला है जीतने का।
अरे तुम ही क्या ? मुझे रोकेगा ये वक्त भी ,
मुझे रोकेगा ये जहां भी ,
ऐसा होता है हर कर्मपथ पर चलने वाले के साथ भी।
मगर जो चलता रहता है वो है जीतता , मगर जो चलता रहता है वो है जीतता।

इसलिए हम चलते है बिना थके
कभी धूप में कभी छांव में,
कभी धूप में कभी छांव में।

जिन्दगी का धुंध ये जिन्दगी के मायने
हमें पता करते है जाना , हमें पता करते है जाना।
क्योंकि कब अंत हो मेरे पथ का
ये मैंने नहीं जाना ,क्योंकि कब अंत हो मेरे पथ का ये मैंने नहीं जाना ।
अभी तक मैंने जो है जाना रुक जाना है मर जाना और
खो जाना है उस बिराने में जहां से न है किसी का आना।
इसलिए हमको चलते जाना है ,
बस चलते जाना।
इसलिए हम चलते है बिना थके
कभी धूप में कभी छांव में ।

कभी धूप में कभी छांव में।

चाहे तेरे रास्ते में आये लाख तुफां,

चाहे तुझे झुकाने को ,तुझे अपने पथ से डिगाने को, आसमां ही क्यों न उतर जाए, तू रुकना नहीं तू झुकना नहीं ।
तेरे चलने पर ही तो है तेरा भविष्य टिका ,
जब तक तू चलेगा तेरा साथ देने हो सकता है कोई ना आए ,
मगर तेरे चले रास्ते पर हर कोई चलेगा ,
मगर तेरे चले रास्ते पर हर कोई चलेगा।

इसलिए हम चलते हैं बिना थके

कभी धूप में कभी छांव में।

कभी धूप में कभी छांव में।

नाव

नाव हिलती डुलती है पर मंजिल की ओर अग्रसर रहती है।

नाव हिलती डुलती है पर मंजिल की ओर अग्रसर रहती है।
पर पतवार किसी और के हाथ में
नाव के अंदर है सवारी बहुत पर मंजिल सब की एक है।
जाना है सबको उस पार,
मगर नाव का तो काम है ढोना
उसे किस बात का रोना ।
ना उसके अपने कोई, ना कोई पराया
ना कोई हमसफ़र, ना कोई साया
सारा संसार बस है माया,
नाव का तो काम है बिना रुके मंजिल तक पंहुचना ।
अगर नाव रुक गया तो रुक जाएगा उसके साथ बहुतों का सफर ।हो सकता है अंत हो जाए ये सफर सुहाना।
मगर नाव रुकता नहीं चलता रहता अपने पथ पर।
लहरें उसको डगमगाती है
कभी आगे कभी पीछे गिराती है
कभी जीतती है कभी हार जाती है।
पर अपने काम को छोड़ नहीं पाती है
नाविक जब थक कर सो जाता है नाव में वह धीरे धीरे उसको सहलाती है