कितनी अरमानों से निकली
तू।
कितनों अरमानों से खेली
तू।
ऐ जिन्दगी जीने के लिए
क्या – क्या नहीं झेली
तू।
अपनों से अनजानों तक
शहर से विरानों तक,
क्या – क्या मंजर ना देखी
तू।
कभी तन्हाई में ,कभी महफ़िल में,
जाने क्या – क्या पापड़ बेली
तू।
कभी तूफानों से ,कभी अरमानों से,
ना जाने कितनों की जिन्दगी से खेली
तू।
कितनी अरमानों से निकली
तू।
कितनों अरमानों से खेली
तू।
ऐ जिन्दगी जीने के लिए
क्या – क्या नहीं झेली
तू।
कभी पत्थरों के शहर से, कभी बागों से,
जाने किस – किस मुकाम से गुजरी
तू।
मेरे विचारों ,मेरे जज्बातों ,मेरे वसूलों से फिसली
तू
कितनी अरमानों से निकली
तू।
कितनों अरमानों से खेली
तू।
ऐ जिन्दगी जीने के लिए
क्या – क्या नहीं झेली
तू।