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बेखबर

उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,


मैं मरने चला वो शहर को चली।


बहुत चाहते थे ,तुमको ए दिल,


ये दिल की लगी है ये मैं ही जानता हूं।


तुमको है क्या ,हंसी तुम बहुत थी,


मेरे दिल को पसंद तुम बहुत थी।


मगर इसी दिल को तुमने धोखा दिया,


तोड़ के मेरा दिल, तूने दिल कहीं और लगा लिया।


आज मेरा दिल फिर छलनी हुआ।


तूने खेला ऐसा खेल दिल जख्मी हुआ,


तेरी करतबों को लोग याद रखेंगे,


तूने जो किया उसे लोग याद रखेंगे।


अब अनजान बन गया तू सब कुछ करके,


तुझे भूल जाएंगे अपना सब कुछ खोके,


उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,
मैं मरने चला वो शहर को चली।

बहुत दिन हुए, तुझसे बात हुए, मुलाकात हुए……



आज फिर उस शहर में, मेरा आना हुआ,
उ नकी गलियों में फिर जाना हुआ।


ख़ामोश रास्ते उनकी गालियां थी ,सुनसान
जैसे उनके बिना सब थे वीरान ।


मैं चलता गया, दिल सिसकता रहा,

उनकी मुहब्बत का मैं, बस याद ले चला,


उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,
मैं मरने चला वो शहर को चली ।

पत्थरों का शहर

अपने शहर में बेगानों सा रहता हूं,

ये हमारी उलझन है या उलझने आम है।

काम तमाम रहता है बोझ बनके ,
या जिन्दगी बोझिल सी लगती है।

अपने पराए हुए लगते है, अब तो,
लगता है, पत्थरों के शहर में रहते है।

जान जो देते थे एक – एक बात पर मेरे लिए
आज वो भी नकाव में चलते है।

रात को दिन का रोना ,दिन को रात का रोना

ये सूरत मेरी है या सूरत ए आम है।