अपने शहर में बेगानों सा रहता हूं,
ये हमारी उलझन है या उलझने आम है।
काम तमाम रहता है बोझ बनके ,
या जिन्दगी बोझिल सी लगती है।
अपने पराए हुए लगते है, अब तो,
लगता है, पत्थरों के शहर में रहते है।
जान जो देते थे एक – एक बात पर मेरे लिए
आज वो भी नकाव में चलते है।
रात को दिन का रोना ,दिन को रात का रोना
ये सूरत मेरी है या सूरत ए आम है।