क्या बात मुकद्दर की करूं
अब समंदर भी कम पड़ने लगे हैं।
मेरी वफा का जो सिला दिया तूने
अब बारिश को भी आंसू आने लगे हैं।
इतिहास नहीं बनाना था मुझे
पर मेरे प्रेम को इतिहास बना दिया तूने।
मेरे दिल के ख्वाहिशों को जिंदा दफना दिया,
मुकद्दर का शहंशाह बनना था मुझे,
पर तूने मुकद्दर का मारा बना दिया।
पर तूने मुकद्दर का मारा बना दिया।