Tag Archives: क्या

ख़ामोश जिन्दगी

क्यूं खामोश है जिन्दगी ,
     क्या बात है?

हर बात में ठंडी आहें,
     क्या बात है?

रात को तारें गिनना,
    गिनकर यूं मुस्कुराना,
          क्या बात है?

राह चलते – चलते यूं गिर पड़ना,
        गिर कर फिर संभल जाना,
                क्या बात है?

जुबां से कोई बात नहीं निकलती,
        दिल के अरमान दबा के बैठे हैं,
                क्या बात है?

जमाने के दर्द को समेटे बैठे है,
        फिर भी आप ऐंठे बैठे है,
               क्या बात है?

क्यूं खामोश है जिन्दगी ,
        क्या बात है?

हर बात में ठंडी आहें,
        क्या बात है?

हालाते शहर देखकर यूं गुम है,
        जज्बातें दर्द बयां नहीं होता,
              क्या बात है?

खामोशी से हर रास्ते नापता गया,
        ये सफर का थकान,
              क्या बात है?

मझधार

क्या लिखूं ए जिन्दगी
मझधार में हूं
दिल को तलाश है
बेकरार भी हूं।
दिल अनजान है,
उदास भी हूं।
कभी कभी तो ऐसा सोचता हूं।
बदल दूं अपनी फितरत को पर,
कुछ ही पलों में फितरत अपना रंग दिखाता है,
और
मैं फिर से मैं हो जाता हूं।

कभी कभी राज से पर्दा हटते हटते,
राज और गहरा हो जाता है ।
हमको लगता है जान गया हूं सब कुछ ,
और कुछ ही पलों में,
अपने आपको छोटा पाता हूं।

टुकड़ों टुकड़ों में लिखता हूं,
या कहूं टुकड़ों टुकड़ों में जीता हूं।
ये दर्द है की घुट घुट के सहता हूं।

मैं क्या कर सकता हूं?

स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामना के साथ

ए मातृभूमि तेरे लिए मैं क्या कर सकता हूं,

तेरे उपकारों का, क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मां मेरी मुझे इक मौका दे,

तेरे लिए मां अपनी शीश कटा सकता हूं।

ए मातृभूमि तेरे लिए मैं क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का ,क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मगर ए मां मैं चाहता हूं कुछ अलग करना,

इसके लिए मुझे चाहे कुछ भी पड़ जाए करना।

मां मैं चाहता हूं दुश्मनों के दांत खट्टे करना,

आंख उठाकर कोई देख ना पाए ,

तेरी ओर ,ऐसा काम करना चाहता हूं।

ऐ मातृभूमि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मां तेरे राहों के काटें निकालना चाहता हूं,

तेरे लिए मां, मैं इस जग को सुंदर बनाना चाहता हूं।

ऐ मातृभूमि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का क्या मैं बदला चुका सकता हूं?