Category Archives: गीत

किस बात का अभिमान?

किस बात का अभिमान?

तेरी शानों शौकत का ,

या तेरी औकात का,

इस बात का अभिमान!

शानो शौकत

या तेरी अमरता का ,

या तेरी चंचलता का,

इस बात का अभिमान!

जरा सोच क्या तेरा है,

तेरी जिंदगी को मौत ने घेरा है।

तेरी धन– संपत्ति ,

क्या तेरे साथ जायेगा?

फिर किस बात का अभिमान?

तूने जो है नाम कमाया है,

तूने जो जमा की माया है,

या तूने पाया सुंदर काया है

इस बात का अभिमान !

माया

कब तक तेरा नाम रहेगा ?

तेरी माया कब तक टिकेगा ?

तेरी सुंदर काया तो कुछ पल का है साया ।

किस बात का अभिमान?

सुंदर काया

सब मिट्टी तो होना है,

क्या पाना क्या खोना है?

तेरी जिंदगी तो बस उसका खिलौना है।

किस बात का अभिमान ?

खिलौना

तेरी माया

है तेरा करम सब तेरी रहम
तूने रचाई कैसी है माया ,

जो देखे तुझे ना कुछ आए नजर
है कैसी ये अंधेरी माया,

सब ओर है तू सब में है,

दिखता नहीं तू क्या नभ में है ,

कैसे खोजूं तुझे ,कैसे पाऊं तुझे
तूने कैसा ये जाल बिछाया।

वक्त का उल्लू

वक्त का उल्लू देख रहा है,

तू जो जज्बातों से खेल रहा है
रात घनेरा दिन का राही ,

क्यों तू आंखे खोल रहा है,

वक्त का उल्लू देख रहा है।

तेरी करनी तेरी भरनी,

क्यों तू बीच में डोल रहा है।

वक्त का उल्लू देख रहा है।

उल्लू

रात दिन का रैन बसेरा
ये जो दिल खिलौना तेरा
क्यों तू इससे खेल रहा है।

वक्त का उल्लू देख रहा है।

तूने दिया किसको अपनापन

जो ये तुम खोज रहा है।

वक्त का उल्लू देख रहा है।

उलझन

क्या लिखूं ए दिल…., है बड़ी मुश्किल

रात दिन के बात में उलझन बनी
दिन निकलता नहीं रात जाती नहीं

इश्क सी हो गई है अंधेरों से
हम तो दिन को भी रात समझते हैं

क्या लिखूं ए दिल…. ,है बड़ी मुश्किल।

बात कुछ भी नही,बड़ी बात है
बात कुछ भी नही,बड़ी बात है।

ये समझ के ना समझना ,

बड़ी बात है..

बेगानी

ना मिलता है राहत कहीं,

तू जो बेखबर हुई।

साथ देते देते जाने कहां खो गई,
क्या बात थी जो बीती बात हो गई।

जिसे समझा था अपना बेगानी बनी।

मेरी आवारगी मेरा निक्कमापन

मेरी आवारगी और मेरा निक्कमापन

यारों ये अब फितरत सी हो गई लगती है।

उनकी गलियों का चक्कर ,

यारों किस्मत सी हो गई लगती है।

जो भी देखता आवारा समझता है,

क्या आपने भी आवारा समझ लिया ।

आपके खातिर ही ये फितरत बनी,

आप की चाहत ने ही निक्कमा किया।

शायद किसी दिन समझोगे इस बात को

मेरी आवारगी और मेरा  निक्कमापन

कुदरत का नियम

क्या खेल रचाया है ,जो तुमसे मिलाया है,

तुमने भी तो क्या, मन भरमाया है।

तेरी नफरत को भी, दिल से लगाया है,

क्या दिल ये बनाया है ,

जो दिल से लगाया है।

ना नजरों से देखी ,ना नजर मिलाया है,

क्या खूब बहाया है ,आंखो में आया है।

क्या खेल रचाया है ,जो तुमसे मिलाया है।

प्रकृति

उम्मीद अभी बांकी है

हर हार के बाद.. तेरी जीत अभी बांकी है.. अभी बांकी है..


क्योंकि उम्मीद अभी बांकी है..
उम्मीद अभी बांकी है..


रात गहरी हो कितनी भी ..पर तेरी सुबह … अभी बांकी है ..

सुबह अभी बांकी है..


दर्द सहे है कितने तुमने…
कितने तुमने ..
उन दर्दों का हिसाब अभी बांकी है..
हिसाब अभी बांकी है..


क्योंकि उम्मीद अभी बांकी है..
उम्मीद अभी बांकी है..


तूने सजाए कई सपने है ..
कई सपने है..
इन सपने को पूरा करना बांकी है..
अभी बांकी है..


क्योंकि उम्मीद अभी बांकी है..
उम्मीद अभी बांकी है..

साथ देना हमारा

साथ देना हमारा ,
साथ देना हमारा..


जब आए मुसीबत..2
साथ देना हमारा ….2


अंधेरी रातों में जब ना दिखता हो कुछ भी.. 2,

अंगुली पकड़ना हमारा…2

साथ देना हमारा…2


बैठ जाऊं हार कर, जब कुछ आए न नजर …2

हौसला बढ़ाना हमारा…2


साथ देना हमारा…2


राह कांटो से भरी हो संग कोई ना हो…2


हाथ देना तुम्हारा ….

हाथ देना तुम्हारा…


साथ देना हमारा,
साथ देना हमारा।


जब तुमको लगे …
मैं गलत राह में हूं..2


राह दिखाना जरा सा ,
राह दिखाना जरा सा,


साथ देना हमारा ,साथ देना हमारा…

बेखबर

उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,


मैं मरने चला वो शहर को चली।


बहुत चाहते थे ,तुमको ए दिल,


ये दिल की लगी है ये मैं ही जानता हूं।


तुमको है क्या ,हंसी तुम बहुत थी,


मेरे दिल को पसंद तुम बहुत थी।


मगर इसी दिल को तुमने धोखा दिया,


तोड़ के मेरा दिल, तूने दिल कहीं और लगा लिया।


आज मेरा दिल फिर छलनी हुआ।


तूने खेला ऐसा खेल दिल जख्मी हुआ,


तेरी करतबों को लोग याद रखेंगे,


तूने जो किया उसे लोग याद रखेंगे।


अब अनजान बन गया तू सब कुछ करके,


तुझे भूल जाएंगे अपना सब कुछ खोके,


उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,
मैं मरने चला वो शहर को चली।

बहुत दिन हुए, तुझसे बात हुए, मुलाकात हुए……



आज फिर उस शहर में, मेरा आना हुआ,
उ नकी गलियों में फिर जाना हुआ।


ख़ामोश रास्ते उनकी गालियां थी ,सुनसान
जैसे उनके बिना सब थे वीरान ।


मैं चलता गया, दिल सिसकता रहा,

उनकी मुहब्बत का मैं, बस याद ले चला,


उस बेखबर को ना खबर ही हुई ,
मैं मरने चला वो शहर को चली ।