Category Archives: कविता

चांद


चांद को देखा मैंने झुरमुट से निकलते ,

कभी इधर से तो कभी उधर से झांकते।

कभी बादलों में छिपते ,
कभी आसमां में खिलते।
कभी इतराते तो कभी,
बादलों कि सवारी करते।
चांद को देखा मैंने झुरमुट से निकलते
कभी इधर से तो कभी उधर से झांकते।
कभी रात को सुलाते ,
कभी खुद ही सो जाते।
कभी तनहाई में,
कभी तारों का महफ़िल सजाते।

चांद को देखा मैंने झुरमुट से निकलते
कभी इधर से तो कभी उधर से झांकते।

मझधार

क्या लिखूं ए जिन्दगी
मझधार में हूं
दिल को तलाश है
बेकरार भी हूं।
दिल अनजान है,
उदास भी हूं।
कभी कभी तो ऐसा सोचता हूं।
बदल दूं अपनी फितरत को पर,
कुछ ही पलों में फितरत अपना रंग दिखाता है,
और
मैं फिर से मैं हो जाता हूं।

कभी कभी राज से पर्दा हटते हटते,
राज और गहरा हो जाता है ।
हमको लगता है जान गया हूं सब कुछ ,
और कुछ ही पलों में,
अपने आपको छोटा पाता हूं।

टुकड़ों टुकड़ों में लिखता हूं,
या कहूं टुकड़ों टुकड़ों में जीता हूं।
ये दर्द है की घुट घुट के सहता हूं।

मैं क्या कर सकता हूं?

स्वतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामना के साथ

ए मातृभूमि तेरे लिए मैं क्या कर सकता हूं,

तेरे उपकारों का, क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मां मेरी मुझे इक मौका दे,

तेरे लिए मां अपनी शीश कटा सकता हूं।

ए मातृभूमि तेरे लिए मैं क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का ,क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मगर ए मां मैं चाहता हूं कुछ अलग करना,

इसके लिए मुझे चाहे कुछ भी पड़ जाए करना।

मां मैं चाहता हूं दुश्मनों के दांत खट्टे करना,

आंख उठाकर कोई देख ना पाए ,

तेरी ओर ,ऐसा काम करना चाहता हूं।

ऐ मातृभूमि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का क्या मैं बदला चुका सकता हूं?

मां तेरे राहों के काटें निकालना चाहता हूं,

तेरे लिए मां, मैं इस जग को सुंदर बनाना चाहता हूं।

ऐ मातृभूमि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूं?

तेरे उपकारों का क्या मैं बदला चुका सकता हूं?