तू शून्य से शिखर चढ़
तू सर्व गुण संपन्न बन
तू कर्म कर तू धर्म कर
तू शून्य से शिखर चढ़।
देश को तू प्राण दे
बड़ो को तू मान दे
तू अजर और अमर बन
तू शून्य से शिखर चढ़।
तू शून्य से शिखर चढ़
तू सर्व गुण संपन्न बन
तू कर्म कर तू धर्म कर
तू शून्य से शिखर चढ़।
देश को तू प्राण दे
बड़ो को तू मान दे
तू अजर और अमर बन
तू शून्य से शिखर चढ़।
जिधर देखो उधर जरूरतमंद है
किसी को इसकी जरूरत ,
किसी को उसकी जरूरत है।
किसी को दिन की जरूरत,
किसी को रात की जरूरत,
जिधर देखो उधर जरूरतमंद है ।
किसी को धन की जरूरत है,
किसी को तन की जरूरत है।
किसी को साथ की जरूरत है
किसी को बात की जरूरत है।
जिधर देखो उधर जरूरतमंद है।
किसी को प्यार की जरूरत है,
किसी को यार की जरूरत है।
किसी को धन अंबार की जरूरत है,
किसी को रोटी की जरूरत है,
जिधर देखो उधर जरूरत मंद है।
किसी को घर की जरूरत है,
किसी को शहर की जरूरत है।
किसी को पानी की जरूरत है,
किसी को वाणी की जरूरत है।
किसी को तन्हाई की जरूरत है,
किसी को महफिल की जरूरत है।
जिधर देखो उधर जरूरतमंद है।
भिखारियों की इस जहां में दाता कहां खोजे
जहां हर एक भिखारी अपने को दाता कहता है।
किसकी कविता किसकी कहानी हो
किसने लिखा तुम्हे ,
किसकी जिंदगानी हो
किसके यादों से निकली ,
किसकी तुम जबानी हो।

कितने अरमानों को अपने अंदर पाली हो,
किसकी मुस्कुराहट किसकी बैचेनी हो,
किसकी कविता किसकी कहानी हो।
कितनी शिद्दत से निकली, कैसी पहेली हो,
जब भी देखा तुम्हे लगती नई नवेली हो।
किसकी कविता किसकी कहानी हो।
जिंदगी हो या जंग हो विकल्प हमेशा दो आते हैं
जंग में जाने के वक्त हमेशा दो विकल्प होते हैं
या तो आप जंग में जाओ या तो पीछे हट जाओ,
अगर जंग में जाते हो तो भी दो विकल्प सामने होते है हारो या जीतो।
जिंदगी के हर क्षेत्र हमेशा ही दो विकल्प मिलते हैं,

कई बार ऐसा लगता है हमारे पास कई सारे विकल्प है लेकिन होते हैं केवल दो
जैसे परीक्षा में एक प्रश्न के उत्तर में चार विकल्प होते है परंतु होते है केवल दो सही या गलत
ये परिस्थितियां हमें दुविधा में डालती हैं।
पर चयन करने पर पता चलता है की विकल्प केवल दो ही थे सही या गलत।
जिंदगी के कई मोड़ पर हमारे साथ ऐसा होता है,
हमें लगता है हमारे पास बहुत विकल्प है और इसी कारण हम किसी भी विकल्प का चयन नहीं कर पाते ।
और कभी कभी ऐसा लगता है हमारे पास कोई विकल्प नहीं है
तब भी हमारे पास दो विकल्प होते है पहला हम विकल्प खोजे और दूसरा परिस्थिति के आगे घुटने टेक दें।
रावण तू कैसा अभिमानी?
क्या तुम्हे अभिमान था अपने भाई पर
या अभिमान था अपने दशो दिशाओं में फैले अपने कुटुंबों पर,
क्या तू अनजान था अपने अंत से?
क्या तू विभिन्न शास्त्रों का ज्ञाता था?
क्या तू भक्त था महाकाल का?
रावण तू कैसा अभिमानी ?

क्या तू अनजान था अपनी अमरता से?
या अनजान था अपनी जय पराजय से ?
जब सब कुछ था तू जानता,
तो दानव कैसे हुआ ?
क्या तू ऋषि का संतान नहीं ?
तेरे खून में उनका खून नही ?
रावण तू कैसा अभिमानी?

क्या तूने बड़ों की बात नहीं मानी?
क्या था तूने मन में ठानी?
रावण तू कैसा अभिमानी?
क्या तू युद्ध के अंत को जानता न था?
रावण तू कैसा स्वाभिमानी ?
क्या अपने इज्जत के खातिर ईश्वर से युद्ध ठानी ?
रावण तू कैसा अभिमानी ?
मैने माना आप भूत काल में यानी पीछे नहीं जा सकते,आपने जो पीछे समय गंवाए है उसको वापस नहीं ला सकते,
पर आप वर्तमान में क्या कर रहें हैं आप अपने बीते समय को याद करके अपने को कोसते है,। तब मैने ऐसा किया होता तो आज मैं ऐसा होता।

तो क्या आप के अपने आप को कोसने से पिछला समय वापस आ सकता है?
तब आपको अगर ये पता है आप पिछला समय वापस नहीं ला सकते तो…
आप अभी एक अच्छी शुरुआत क्यों नही कर रहें हैं?
आप पीछे हुए घटनाओं से सिख ले कर वर्तमान में अच्छी शुरुआत कर सकते है।
तो आइए हम सब अतीत को सबक मानते हुए वर्तमान में एक नया शुरुआत करते है।
और जिंदगी को सहज सरल और आनंदमय बनाते हैं।
धन्यवाद
जिंदगी और सफर ये दोनों एक दूसरे के पूरक है।
आप जिंदगी के बारे में सोचो,
या
की सफर के बारे में सोचो,
आप को समझ में आ जायेगा।
आइए थोड़ा विचार करें?
पूरा जिंदगी एक सफर है
जिस में हम सफर करके जिंदगी के एक छोड़ से दूसरे छोड़ तक जाते है,
यानी
बचपन से बुढ़ापा, जन्म से मृत्यु।
सफर भी हमें एक छोड़ से अपनी मंजिल तक पहुंचाती है,
जिंदगी आपकी है आप चुनते है आप कैसे तय करेंगे,और सफर भी विकल्प देते हैं को आप कैसे रास्ते तय करेंगे,
जैसे कभी कभी –कभी सफर में कोई सवारी नहीं मिलती और आपको पैदल सफर करना परता है।
ठीक उसी तरह जिंदगी में भी कभी–कभी आपको बिना किसी सहारे के चलना पड़ता है।

सफर पर आपके बैकअप काम करते हैं जैसे परिवार,दोस्त,आपको अगर कोई सवारी नहीं मिली ,तो आपको लेने आते है,आपको मंजिल तक पहुंचने में मदद करते हैं।
जिंदगी में भी उसी तरह आपका बैकअप काम करता है, आपका मदद करता है जैसे– परिवार ,दोस्त,आपके मुश्किल वक्त में आपका साथ देता है।

जिस तरह आप सफर में रास्ते का चयन करते हैं की आपको किस रास्ते से जाना है सड़क कैसी है? आप सफर ship से करते हो या plane से करते हो ,कैसे शॉर्टकट लेते हो,ये सारे आपके मंजिल तक पहुंचने में मदद करते हैं,लेकिन ये आपको की किस तरह के मंजिल पर पहुंचाता है ये आप पर है की आपने कैसा शॉर्टकट लिया है।

जिंदगी में भी आपके द्वारा सोचा गया सफर की आप किस तरह अपनी जिंदगी की सफर पूरा करोगे, आपने कैसी मंजिल चुनी है,मंजिल तक पहुंचने के लिए आपने कैसी तैयारी की है,या आपने शॉर्टकट लिया है।
जैसे सफर में चलते वक्त आपको साथी मिलते है,आपको नए तरह के दोस्त मिलते है,कितने ऐसे मिलते है जो आपको अपने रास्ते से भटकाकर आपको लुटते है,कितने आपके साथ आपको मंजिल तक देते हैं।अगर भटक गए सफर में तो रास्ते में ही रह जाते हैं।
जिंदगी ठीक सफर की तरह आपको कई मिलते है जो दोस्त बनते है दुश्मन बनते है, सही राह दिखाते है, कोई मंजिल से भटकाते है, कोई बिभन्न तरह के गंदी आदतों को लगाते हैं।अगर हम भटक गए तो अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते है।

अगर हम सूक्ष्मता से विचार करें तो सफर और जिंदगी में बहुत समानता देखने को मिलती है।
इस लिए तो कहते हैं– जिंदगी एक सफर है सुहाना ..यहां कल क्या हो किसने जाना?
सर पे मौत खड़ी है,
फिर भी लोभ में पड़ी है।
क्या ये तेरे जिंदगी से बड़ी है,
फिर भी जिद पे अड़ी है ।
तू किसके लिए ये लफड़ा ले रहा है,
है कौन जिससे खेल रहा है?
क्या ये बात इतनी बड़ी है?
सर पे मौत खड़ी है,
फिर भी जिद पे अड़ी है।

कैसी ये आरजू कैसा नशा है?
किसने बहकाया तुझे,
किसकी खता है?
अरे सर पे मौत खड़ी है ,
फिर भी जिद पे अड़ी है।
लोभ के कारण क्यों पाप करे है?
पाप के घड़ा को क्यों भरे है?
ये बदमाशी क्यों करे है?
अरे सर पे मौत खड़ी है,
फिर भी जिद पे अड़ी है।
क्यों दिल का दर्द
मैं बाहर नहीं निकाल पाता हूं
जो मैं लिखना चाहूं,
लिख नहीं पाता हूं।
मैंने सहे एक से एक जख्म,
क्यों दिल के जख्म दिखा नहीं पाता हूं,
जो मैं लिखना चाहूं,
लिख नहीं पाता हूं।
ये सर्द हवाएं और बारिश की बूंदे,
सब महसूस करता हूं,
पर अपने जज्बात,
बाहर निकाल नहीं पाता हूं,
जो मैं लिखना चाहूं ,
लिख नहीं पाता हूं।

इतना सुंदर ईश्वर की रचना है,
फिर क्या सोचना है,
अपने सोच को ,
बाहर निकाल नहीं पाता हूं,
जो मैं लिखना चाहूं,
लिख नहीं पाता हूं ।
अपनी इज्जत बनाना,
इज्जत बचा के रखना,
सब के बस की बात नहीं।

अच्छी आदत डालना ,
गंदी आदत छोड़ना ,
सब के बस की बात नहीं।

सब के सामने सच बोलना ,
सच बोल के सच पर रहना ,
सब के बस की बात नहीं।

अपने मन को बहलाना,
और उसको काबू में रखना ,
सबके बस की बात नहीं।

अपने अहंकार को दबाना ,
गुस्से को काबू में रखना,
सबके बस की बात नहीं।