तेरे शहर में

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

लिखा तख्त पे अंदर आना मना है..

लिखा तख्त पे अंदर आना मना है..

मैं किस ओर जाऊं………

उधर जाना मना है…

मैं किस ओर जाऊं………

उधर जाना मना है…

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में..

तख्त

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

मैंने खोजा जिसे ओ शख्स आम न था..

जब मिला तो समझा.. ओ शहरी हो गया था

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में..

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

मैने सोचा था जैसा वैसा कुछ भी न पाया…

सब पैसा के पीछे इस कदर पड़े थे…

न अपना ख्याल न दिन का पता था…

मैने देखी नहीं इक भी तितलियां …

ना फूलों पे भंवरे …न नदी में कमल थे..

न नदी में कमल थे..

फूल

ऐसा लगता था सब.. कमाने गए थे..

ऐसा लगता था सब.. कमाने गए थे..

जाने अनजाने चेहरे तेरे शहर में..

मैं देखूं किसे सारे अनजान बनते…

2 thoughts on “तेरे शहर में”

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