ख़ामोश जिन्दगी

क्यूं खामोश है जिन्दगी ,
     क्या बात है?

हर बात में ठंडी आहें,
     क्या बात है?

रात को तारें गिनना,
    गिनकर यूं मुस्कुराना,
          क्या बात है?

राह चलते – चलते यूं गिर पड़ना,
        गिर कर फिर संभल जाना,
                क्या बात है?

जुबां से कोई बात नहीं निकलती,
        दिल के अरमान दबा के बैठे हैं,
                क्या बात है?

जमाने के दर्द को समेटे बैठे है,
        फिर भी आप ऐंठे बैठे है,
               क्या बात है?

क्यूं खामोश है जिन्दगी ,
        क्या बात है?

हर बात में ठंडी आहें,
        क्या बात है?

हालाते शहर देखकर यूं गुम है,
        जज्बातें दर्द बयां नहीं होता,
              क्या बात है?

खामोशी से हर रास्ते नापता गया,
        ये सफर का थकान,
              क्या बात है?

Leave a comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.