अब दर्द का दर्द से रिश्ता बन रहा है।
तेरा यूं नजर चुराना मेरे दर्द का सबब बन रहा है।
दिन हो या रात हो बस तेरी ही बात हो।
डूब के दर्द में दर्द से ही इश्क करने लगा हूं।
ये मेरे दिल का भ्रम है या सचमुच तुम हो।
मेरी बातों का हो सकता है
कोई अर्थ ना हो तेरी नजरों में,
मगर मेरी बातों को मैं या मेरा दिल जानता है।
राहत मिलती नजर नहीं आती अब तो,
रह रह के इक हुक सी उठती है।
जाने कब तक ,जाने कब तक
तेरे लिए चाहतों का गुब्बार सा उठता है,
पर तेरी चाहतें भी तो दर्द देके जाती है।
लाख अनजान बनू तुझसे,
पर तू है कि दिल का दर्द बन के निकलती है।
गजब
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धन्यवाद्
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