खोज

हर इंसान के अंदर हमेशा खोज चलता रहता है।
और उम्र के साथ उसकी अंदर के खोज को वह बाहर खोजने लगता है,
इसलिए वह हर वस्तु को खोजी की तरह देखता है।
और जहां भी उसे उसके खोज से संबधित वस्तु आभास होता है ,
वह उधर मुड़ जाता है।
उस खोज के कारण वह कई चीजों को अपनाता है। कुछ पलों तक वह उस चीज से बंधा रहता है,

और कुछ समय के बाद वह फिर से खोज शुरू कर देता है।
पूरी जिन्दगी उसकी खोज चलती रहती है।
अपनी ज्ञान के अनुसार वह खोज जारी रखता है,

उम्र के अनुसार उसकी खोज को अलग – अलग रास्ते मिलते है।
हर बाहरी रास्तों पर उसकी खोज जारी रहती है।

खोज करते -करते वह मृत्यु को प्राप्त होता है,

ठीक उसी तरह जिस तरह मृग कस्तूरी के खुशबू को ढूंढती है।
और उसको पता नहीं ये खुशबू उसके अंदर ही है।

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