मझधार

क्या लिखूं ए जिन्दगी
मझधार में हूं
दिल को तलाश है
बेकरार भी हूं।
दिल अनजान है,
उदास भी हूं।
कभी कभी तो ऐसा सोचता हूं।
बदल दूं अपनी फितरत को पर,
कुछ ही पलों में फितरत अपना रंग दिखाता है,
और
मैं फिर से मैं हो जाता हूं।

कभी कभी राज से पर्दा हटते हटते,
राज और गहरा हो जाता है ।
हमको लगता है जान गया हूं सब कुछ ,
और कुछ ही पलों में,
अपने आपको छोटा पाता हूं।

टुकड़ों टुकड़ों में लिखता हूं,
या कहूं टुकड़ों टुकड़ों में जीता हूं।
ये दर्द है की घुट घुट के सहता हूं।

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