Category Archives: मोटिवेशनल बातें

मोटिवेट करने वाली बातें

अंत या शुरुआत

हर अंत एक शुरुआत लेके आती है,

लेकिन ये पता उसे ही चलता है जिसने इसे महसूस किया है।

जैसे समंदर की लहरें हर बार किनारे आकार अपने अंत को प्राप्त होती है ,

फिर से नए लहर का रूप लेने के लिए।

बदला

तुमको जो समझना समझ,

अगर तू चाहती हो बदला लेना,

तो लो बदला ,

लेकिन याद रखना बदला बदलाहट नहीं ,

करुवाहट ही लाता है,

माफ करना तेरी फितरत नहीं हो,

हो सकता है ,

लेकिन

अगर माफ करती हों,

तो बदलाहट जरूर होगी

मनवीर

मदद

मैं बस में चढ़ गया। अंदर भीड़ देखकर मैं परेशान हो गया। बैठने की जगह नहीं थी। तभी, एक व्यक्ति ने अपनी सीट खाली कर दी। खाली सीट के बगल में खड़ा आदमी वहाँ बैठ सकता था, लेकिन इसके बजाय उसने मुझे सीट की पेशकश की।


अगले पड़ाव पर फिर वही काम हुआ। उसने अपनी सीट दूसरे को दे दी। पूरी यात्रा के दौरान 4 बार ऐसा हुआ। वह आदमी एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह लग रहा था, दिन भर काम करने के बाद घर लौट रहा था …
आखिरी पड़ाव पर जब हम सभी उतर गए, मैंने उससे बात की।
“हर बार खाली सीट मिलने पर आप किसी अन्य व्यक्ति को अपनी सीट क्यों दे रहे थे?”
उनका जवाब मुझे आश्चर्यचकित कर गया।
“मैंने अपने जीवन में बहुत अध्ययन नहीं किया है और न ही मुझे बहुत सी बातें पता हैं। मेरे पास ना तो बहुत पैसा नहीं है। इसलिए मेरे पास किसी को देने के लिए बहुत कुछ नहीं है। इसीलिए मैं यह रोज़ करता हूँ। यह एक ऐसी चीज़ है जो मैं कर सकता हूँ। आसानी से कर सकता हूं।
“पूरे दिन काम करने के बाद भी मैं थोड़ी देर तक खड़ा रह सकता हूं। मैंने अपनी सीट आपको दे दी और आपने धन्यवाद कहा। इससे मुझे संतोष हुआ कि मैंने किसी के लिए कुछ किया है।”
मैं इसे दैनिक तौर पर करता हूं और महसूस करता हूं कि मैं किसी तरह से अपना योगदान दे रहा हूं। मैं हर दिन घर में ताज़ा और खुश होकर आता हूं कि मैंने किसी को कुछ दिया। “
मैं अवाक था!!! दैनिक आधार पर किसी के लिए कुछ करने की चाहत ही अंतिम उपहार है।

इस अजनबी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया –
भीतर से अमीर बनना कितना आसान है!

सुंदर कपड़े, बैंक खाते में बहुत सारे पैसे, महंगे गैजेट्स, सामान और विलासिता या शैक्षिक डिग्री – आपको अमीर और खुश नहीं कर सकते हैं;

लेकिन देने का एक छोटा सा कार्य आपको हर रोज़ समृद्ध और खुश महसूस करने के लिए पर्याप्त हैं।18 दिन के युद्ध ने,
द्रोपदी की उम्र को
80 वर्ष जैसा कर दिया था …

शारीरिक रूप से भी
और मानसिक रूप से भी

शहर में चारों तरफ़
विधवाओं का बाहुल्य था..

पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था

अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और उन सबकी वह महारानी
द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में
निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को निहार रही थी ।

तभी,

श्रीकृष्ण
कक्ष में दाखिल होते हैं

द्रौपदी
कृष्ण को देखते ही
दौड़कर उनसे लिपट जाती है …
कृष्ण उसके सिर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं

थोड़ी देर में,
उसे खुद से अलग करके
समीप के पलंग पर बैठा देते हैं ।

द्रोपदी : यह क्या हो गया सखा ??

ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।

कृष्ण : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !

वह हमारे कर्मों को
परिणामों में बदल देती है..

तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी !

तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ… सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं,
सारे कौरव समाप्त हो गए

तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए !

द्रोपदी: सखा,
तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या उन पर नमक छिड़कने के लिए ?

कृष्ण : नहीं द्रौपदी,
मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूँ
हमारे कर्मों के परिणाम को
हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं..
तो, हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता।

द्रोपदी : तो क्या,
इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ कृष्ण ?

कृष्ण : नहीं, द्रौपदी
तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो…

लेकिन,

तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।

द्रोपदी : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

तुम बहुत कुछ कर सकती थी

कृष्ण:- जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ…
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का एक अवसर देती
तो, शायद परिणाम
कुछ और होते !

इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया…
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती तो भी, परिणाम कुछ और होते ।

और

उसके बाद
तुमने अपने महल में दुर्योधन को अपमानित किया…
कि अंधों के पुत्र अंधे होते हैं।

वह नहीं कहती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता…

तब भी शायद, परिस्थितियाँ कुछ और होती ।

“हमारे शब्द भी
हमारे कर्म होते हैं” द्रोपदी…

और, हमें

“अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना
बहुत ज़रूरी होता है”…
अन्यथा,
उसके दुष्परिणाम सिर्फ़ स्वयं को ही नहीं… अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है…
जिसका
“ज़हर”
उसके
“दाँतों” में नहीं,
“शब्दों ” में है…

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करें।

ऐसे शब्द का प्रयोग कीजिये जिससे, .
किसी की भावना को ठेस ना पहुँचे।

क्योंकि……. महाभारत हमारे अंदर ही छिपा हुआ है ।एक महिला की आदत थी कि वह हर रोज रात में सोने से पहले अपनी दिन भर की खुशियों को एक काग़ज़ पर लिख लिया करती थीं।

एक रात उसने लिखा…
मैं खुश हूं कि मेरा पति पूरी रात ज़ोरदार खर्राटे लेता है क्योंकि वह ज़िंदा है और मेरे पास है ना…भले ही उसकी खर्राटो की आवाज़ मुझें सोने नहीं देते…ये भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि मेरा बेटा सुबह सवेरे इस बात पर झगड़ता है कि रात भर मच्छर-खटमल सोने नहीं देते यानी वह रात घर पर गुज़रता है आवारागर्दी नहीं करता…इस पर भी भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि हर महीना बिजली,गैस, पेट्रोल, पानी वगैरह का अच्छा खासा टैक्स देना पड़ता है ,यानी ये सब चीजें मेरे पास,मेरे इस्तेमाल में हैं ना… अगर यह ना होती तो ज़िन्दगी कितनी मुश्किल होती…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…..

मैं खुश हूं कि दिन ख़त्म होने तक मेरा थकान से बुरा हाल हो जाता है….यानी मेरे अंदर दिनभर सख़्त काम करने की ताक़त और हिम्मत सिर्फ ऊपरवाले के आशीर्वाद से है…

मैं खुश हूं कि हर रोज अपने घर का झाड़ू पोछा करना पड़ता है और दरवाज़े -खिड़कियों को साफ करना पड़ता है शुक्र है मेरे पास घर तो है ना… जिनके पास छत नहीं उनका क्या हाल होता होगा…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…

मैं खुश हूं कि कभी कभार थोड़ी बीमार हो जाती हूँ यानी कि मैं ज़्यादातर सेहतमंद ही रहती हूं।इसके लिए भी भगवान का शुक्र है..

मैं खुश हूं कि हर साल दिवाली पर उपहार देने में पर्स ख़ाली हो जाता है यानी मेरे पास चाहने वाले मेरे अज़ीज़ रिश्तेदार ,दोस्त हैं जिन्हें उपहार दे सकूं…अगर ये ना हों तो ज़िन्दगी कितनी बे रौनक हो…?इस पर भी भगवान का शुक्र है…..

मैं खुश हूं कि हर रोज अलार्म की आवाज़ पर उठ जाती हूँ यानी मुझे हर रोज़ एक नई सुबह देखना नसीब होती है…ज़ाहिर है ये भी भगवान का ही करम है…

जीने के इस फॉर्मूले पर अमल करते हुए अपनी भी और अपने से जुड़े सभी लोगों की ज़िंदगी संतोषपूर्ण बनानी चाहिए…..छोटी-छोटी परेशानियों में खुशियों की तलाश..
खुश रहने का अजीब अंदाज़…औऱ हर हाल में खुश रहने की कला ही जीवन है…….!!

साभार

प्रेम

जन्म, प्रेम , मृत्यु एक अटल सत्य है।


जन्म लेता है जीव और अपने ईश्वर से प्रेम करता है।


एवम अंत में मृत्यु को प्राप्त होता है।


जन्म और मृत्यु आपके वश में नहीं ,


लेकिन प्रेम तो आपके वश में है ,


आपका प्रेम कैसा है

ये आपने अपने प्रेम को कितना समझा है ,

इसपर निर्भर करता है।


आप जिंदगी भर जिसकी तलाश करते है?


और जब अंत समय में जब आपको समझ मिलता है

तब आप मृत्यु के नजदीक रहते हैं ,

तो पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।


तब आप अपने आप को कोसते है ,

मैंने इतना समय इसको खोजने में लगा दिया।


प्रेम के वश में हैं भगवान,


जीव एक दुसरे से प्रेमवश जुड़ा रहता है।

कीमत

समय एक ऐसा पल है जिसको गुजरना ही है,
ये हम सब जानते है।फिर भी वक्त गुजरने के बाद हम हाथ मलते रह जाते है।
और वक्त रहते हम कोई काम नहीं कर पाते और हमेशा सोचते है वक्त बहुत है लेकिन समय बहुत तेजी से बदल रहा होता है।

सेहत – ऐसी ही हालात हम अपनी सेहत के साथ भी करते है
जब हम स्वस्थ रहते है तो बहुत सारा दबाव अपने ऊपर लेते है।
जैसे खाना जो भी होता है हम खाते जाते है, खाते जाते है। चाहे वह स्वास्थ्य पर कैसा भी असर डाले ।बिना सोचे समझे हम पेट भर लेते है।
इसी तरह हम अपने दिमाग के साथ भी करते है।
जो भी समाचार हो दिमाग में भरते जाते है ,
बिना सोचे समझे ,चाहे वह आपके दिमाग पर कैसा भी असर डाले।
अंत में पता तब जाके लगता है जब हमारी तबीयत खराब होती है।
सम्बन्ध – इसी तरह हमारे संबंधों के साथ भी होता है।
जब तक होता है उसकी अहमियत पता नहीं चलती।
जब संबंध नहीं रहते तब जाके उसकी अहमियत पता चलती है।
और हम पछताते रह जाते है।

हमें ऐसा लगता है समय, सेहत
और सम्बन्ध
इन तीनों की कोई कीमत नहीं होती, अक्सर इन सब को खोने के बाद इनकी कीमत का पत्ता चलता है।

खोज

हर इंसान के अंदर हमेशा खोज चलता रहता है।
और उम्र के साथ उसकी अंदर के खोज को वह बाहर खोजने लगता है,
इसलिए वह हर वस्तु को खोजी की तरह देखता है।
और जहां भी उसे उसके खोज से संबधित वस्तु आभास होता है ,
वह उधर मुड़ जाता है।
उस खोज के कारण वह कई चीजों को अपनाता है। कुछ पलों तक वह उस चीज से बंधा रहता है,

और कुछ समय के बाद वह फिर से खोज शुरू कर देता है।
पूरी जिन्दगी उसकी खोज चलती रहती है।
अपनी ज्ञान के अनुसार वह खोज जारी रखता है,

उम्र के अनुसार उसकी खोज को अलग – अलग रास्ते मिलते है।
हर बाहरी रास्तों पर उसकी खोज जारी रहती है।

खोज करते -करते वह मृत्यु को प्राप्त होता है,

ठीक उसी तरह जिस तरह मृग कस्तूरी के खुशबू को ढूंढती है।
और उसको पता नहीं ये खुशबू उसके अंदर ही है।

यात्रा

अनवरत चलने वाला यात्रा है ये

बस इक पराव से मोह किस हद तक उचित है।

हर बार की तरह इस बार भी जाना तो पड़ेगा ही।

अपनी छोटी बड़ी सोच से उपर उठना तो होगा ही।

रात कितनी भी गहरी क्यों न हो

सवेरा तो होगा ही।

तेरे चैतन्य में प्रकाश तो फैलेगा ही।

तू सत्कर्म में रत हो।

तेरे आनंद का कारण तू ही है।

तेरा आनंद कहीं बाहर नहीं है।

तू क्षणिक सुख के चक्कर में,

अपनी असीम आनंद को छोड़ रहा।

तू जब खुद को समझ ना पाया,

तो दूसरों को क्या समझेगा।

इसलिए

तू तेरा समझ मैं मेरा समझता हूं,

बस यही होने दे।

तेरे समझ में जब तू नहीं आएगा,

मेरे समझ में जब तक मैं नहीं आऊंगा,

सारी दुनिया को क्या खाक समझ पाऊंगा।

कठपुतली

अब उसकी बातों में आकर अचानक उसने अपना इरादा
बदल लिया।

विभिन्न तरह के बातों को सुनते सुनते वह सत्य से दूर होता चला गया।

अब उसके लिए ये कठिन है सही और ग़लत को अलग करना।

सत्य और असत्य दोनों से अनजान है।

अब उसके फैसले उसके नहीं है।

ना उसका खाना उसका है ,

ना उसका विस्तर उसके अपने अनुसार है।

उसने अपने सोचने समझने कि शक्ति किसी और के हाथ में दे रखा है।

अपने शरीर पर जो कपड़े पहनते हैं उसमें भी उसकी मर्जी नहीं है।
उसने अपने आपको उसके हाथों की कठपुतली बना रखा है।

और ये अकेले नहीं है बेबस।

उसके आगे तो सब उसका ही सुनता है। सब गुलाम हो गए है।

सबको उसने सम्मोहित कर रखा है।

वही जो बताता सब खाते हैं।

आखिर कौन हैं वो?

जिसने हम सबको सम्मोहित कर रखा है।

कौन है?

वो जादूगर है।

विज्ञापन
हां विज्ञापन के कहे अनुसार तो हम लोग चलते है,

खाते,पीते और सोते हैं।

इसी के गुलाम है हम लोग,

इसी के हाथों के कठपुतली है।

माया

माया क्या है?

क्या हम सब इससे बंधे है?

क्या संसार सम्पूर्ण माया है ?

अब बात ये है कि हम माया को कैसे जाने?

इसका एक प्रत्यक्ष प्रमाण है।

की अगर कोई इंसान आपके अनुसार से कार्य नहीं कर रहा है,
तो मायावश आपको क्रोध आनी है।
अगर कोई आपका कार्य करे तो ,
या आपकी बड़ाई करे तो आप उसको पसंद करते है।

कोई आपका इज्जत करे तो आप खुश होते हो मायावश अच्छा अनुभव होता है।

यदि आपका कोई बुराई करे या आपकी बातों की अवहेलना करे तो मायावश आप उससे ईर्ष्या और द्वेष रखते हो।

आपको अपने मान अपमान का डर होता है ।

आपके लिए आपकी इज्जत ही सबसे बड़ी होती है ,
यही सब तो है माया – राग ,द्वेष ,प्रेम, घृणा ,क्रोध आदि ये सब माया के ही तो हथियार है।

और हमसब उसके शिकार है।

इसलिए तो कहते है जिसने माया का पार पाया उसके लिए मान और अपमान दोनों बराबर है।

आप उनका अपमान करो तो भी ठीक ,या आप उनको मान दो तो भी ठीक।

इनको पता है कि ये सब माया है,
और ये सब चलता रहेगा ।

संपूर्णता

दुनिया में सिर्फ दो तरह के इंसान का अस्तित्व है,

योगी और भोगी,

दूसरे तरीके से कहे तो इस दुनिया में दो तरह के लोग रहते है।

योगी एवम् भोगी,

अगर आप पूर्णता का अल्पकालिक अनुभव करना चाहते है

तो

आप भोगी की राह पर जा सकते है ,

या आप दीर्घकालीन पूर्णता का अनुभव करना चाहते है
तो

योगी के राह पर चल सकते है।

अगर योग और भोग दोनों का अनुभव करना चाहते है

यानी

योग और भोग,दोनों के साथ रहना चाहते है ,

तो

दोनों के बीच सही तालमेल रखना होगा,

जिससे आप संपूर्णता का अनुभव कर सके।

सारांश :- हमें जिन्दगी में संपूर्णता का अनुभव

करने के लिए योग एवम् भोग को संतुलित करना होगा